Wednesday, November 10, 2010

आप-बीती----०३. नवम्बर माह.

     दुनिया में जो कुछ भी आज हम देखते है,उसके अन्दर कुछ न कुछ है.यही कुछ न कुछ सच्चाई है या न मानो तो मिथ्या.मैंने लोगो को तरह -तरह के तर्क देते और आलोचना करते देखा है यह आलोचना मौखिक भी और लिखित भी.बहुत से लोग इस दुनिया में किसी चीज पर भरोसा ही नहीं करते.अगर एसा होता तो हम कहा से आते थे.अगर हम है,तो दुनिया में भी कुछ चीजे सच्चाई से ओत-प्रोत भी है.और हम सब किसी के हाथ के गुलाम है .जो हमे पूरी तरह से बन्दर की भाती नचाता है..यहाँ तक की हमारे स्वर भी उसके इशारे से ही निकलते है.यहाँ सबसे बड़ी बात यह है की यह मानना ,हमारे ऊपर संभव है.
                रही मेरी बात तो मै दुनिया के हर सृष्टी में  किसी के सजीव करामत का दर्शन पाता हूँ.और मानता हूँ की बिना उसके इशारे एक पत्ता भी नहीं हिल सकता है. जाको रखे साईया ,मार सके न कोय.यह कथानक जब कही गयी होगी उस समय क्या हुआ होगा ? या जिसने यह पहले कहा ,उसने क्या कुछ देखा होगा ? ,जिससे यह उदगार ध्वनित हुए.जरुर सोंचने वाली बात है .गहराई से परख करने होंगे.
                इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए ,और वैसे मुझे हमेशा समय का अभाव रहता है,इसी लिए ज्यादा बात न बढ़ कर ,इस माह के आप-बीती के कड़ी में एक सच्ची घटना बर्णित कर रहा हूँ.इसमे बिस्वास करे या न करे कोई जोर जबरदस्ती नहीं है,पर हाँ,अपनी टिपण्णी देना न भूले.
                बात उन दिनों की है ,जब मै सवारी गाड़ी के लोको चालक के रूप में पदोन्नति लेकर पाकाला DEPOT में पदस्थ था.पाकाला आंध्र प्रदेश के चित्तूर  जिले में पड़ता है.यहाँ से तिरुपति महज ४२ किलोमीटर है.यह घटना तारीख १५.०२.१९९९ बरस की है दिन सोमवार था.और मै २४८ सवारी ट्रेन को लेकर ,धरमवारम ( यहाँ सत्य साईं बाबा का अस्राम है,जो अनंतपुर जिले में पड़ता है.)से ०८.५५ बजे सुबह ड्यूटी में लगा था,और अपने हेड कुँर्टर पाकाला की तरफ आ रहा था.एक ह्रदय बिदारक  घटना घटी ,जिसे मै मरने तक भी याद रखूँगा और यह घटना मुझे हमेशा याद आती रहती है.
                 हुआ यह की जब मेरी ट्रेन मदन पल्ली स्टेशन के सिगनल के करीब पहुँचने वाली थी,तभी एक नौजवान औरत करीब २२-२३ बरस की होगी ,अपने गोद  में  करीब एक बरस की बच्ची को लिए हुए थी,अचानक पटरी के बिच में आकर कड़ी हो गई..मेरे गाड़ी की गति करीब ५०-६० के बिच थी ,मैंने उसे देख कर EMERGENCY ब्रेक  लगा दी गाड़ी तो रुकी पर उस महिला को समेत ले गई.मै समझ गया ,की यह कैसे पाप का भागी बन गया.खैर ट्रेन रुक गई.मैंने ट्रेन गार्ड को सूचना देदी.और कहा की पीछे जाकर उस बॉडी की मुआयना करे और देखे की क्या हम कुछ कर सकते है जैसे की फर्स्ट ऐड वगैरह.
                साथ ही साथ मैंने अपने सहायक लोको चालक को जाकर देखने को कहा.मेरा सहायक लोको चालक श्री टी.म.रेड्डी थे और ट्रेन गार्ड श्री रामचंद्र.कुछ समय के बाद मेरा सहायक चालक  मुझे जो खबर ,वल्कि-तलकी के माध्यम से दी वह चौकाने वाली थी, सूचना----१) उस महिला की सर में चोट लगाने की वजह से मौत हो चुकी थी.और ट्रक के किनारे उसकी मृत शारीर  पड़ी हुई थी.सर से खून लगातार रिस रहा था.  २)दूर कंकड़-पत्थर के ऊपर उसकी छोटी बच्ची पड़ी हुई थी.
                अब  समस्या थी उनके मृत सशरीर को उठा कर ट्रेन में लोड करने की .तो मैंने ट्रेन गार्ड और अपने सहायक को कहा की दोनों को ---उठा कर गार्ड ब्रेक्भैन में लोड कर लें,उनहोने ऐसा ही किया.महिला को कुछ PASSENGER की मदद से ब्रेक में लोड कर दिया गया.और जब मेरा सहायक उस बच्ची को,पत्थर  पर से ,ज्यो ही उठाना चाहा और उसे छुआ वह बच्ची तुरंत रो पड़ी और डरी-डरी सी काम्पने लगी.
                   यह नजारा देख कर ,सारे के सारे ट्रेन यात्री ,हक्का-बक्का से रह गए क्यों की जिस चोट से उसकी माँ की मृत्यु हो गयी थी,उसी गंभीर चोट के बावजूद भी वह जिन्दा थी.वाह ..क्या कुदरत की कमाल है.,इस दृश्य को जिन्हों ने देखा,वे जहा भी होंगे लोगो में चर्चा जरुर करते होंगे.हमने ट्रेन को चालू किया और मदन पल्ली रेलवे स्टेशन पर आगये.उस बच्ची को थोड़ी सी चोट आई थी इस लिए रेलवे डॉक्टर को तुरंत बुलाया गया क्योकि मदनपल्ली में रेलवे हेअलथ उनित है.बाकि जरुरी करवाई करने के बाद ,दोनों को ड्यूटी पर तैनात स्टेशन मेनेजर को सौप दिया गया ,ताकि आस-पास के गाँव में ,सूचना फैलने के बाद,उचित परिवार को उनकी बॉडी सौपा जा सके.
                     मै शाम को ५ बजे पाकाला पहुंचा और सारी घटना ,अपनी पत्नी को बताई मेरी पत्नी ने जो कहा वह वाकई नमन के योग्य है .मेरी पत्नी ने कहा की उस बच्ची को घर लाना था हम पाल-पोस लेते थे.मै अपने पत्नी की इच्छा को सुन कर कुछ समय के लिए दंग रह गया और मन ही मन अपने पत्नी और उस दुनिया को बनाने वाले को नमन किया.मेरे आँखों में आंसू आ गए क्यों की हमें कोई लड़की नहीं है मै सिर्फ इतना ही कह सका की ठीक है अगले ट्रिप जाने के समय उस स्टेशन पर पता करूँगा अगर किसी ने नहीं ले गया होगा तो उस बच्ची को अपने घर ले आऊंगा.
                    सोंचता हूँ आज मेरे पास वह सब कुछ है जो इस आधुनिक ज़माने में लोग इच्छा रखते है,दो सुनहले सुपुत्र भी है,पर बेटी नहीं है,इसकी इच्छा सायद भगवान ने पूरी नहीं की.अतः जहा कही भी किसी लड़की की सादी वगैरह होती है ,कुछ न कुछ मदद कर देता हूँ.
                     दूसरी बार ,जब मै मदनपल्ली गया तो उस बच्ची के बारे में पता किया, वह महिला पास के गाँव की रहने वाली थी.उसके माता-पिता ,आकर उसके शव को और बच्ची  ले गए थे.सोंचता हूँ,आज वह बच्ची करीब १२ बर्ष की हो गयी है . उससे मिलने और उसे देखने की इच्छा आज भी है ,लेकिन उसका पता मालूम नहीं है.कई बार मदन पल्ली के स्टेशन मेनेजर से संपर्क बनाया पर उस समय ड्यूटी पर रहने वाले मास्टर के सिवा इस बात/घटने की जानकारी किसी और को नहीं है.
                     लोग इस तरह आत्महत्या क्यों करते है.क्या इस कार्य से वे संतुस्ट हो जाते है? क्या घरेलु झगड़े का इस तरह निदान ठीक है?मनुष्य को श्रधा  और शब्र से काम लेना चाहिए .मै सोंचता हु इस घटना के पीछे भी कोई घरेलु झगडा होगा.हमें जीवन को इतना कमजोर  नहीं समझना चाहिए. जरुरत है अच्छे कामो में लगाने की .
   आखिर क्यों ? उस छोटी बच्ची को कुछ भी नहीं हुआ.जब-की उसकी माँ मृत्यु के हाथो समां गयी.

3 comments:

  1. सभी प्राणियों में मनुष्य इसलिए श्रेष्ठ है कि वह संवेदनशील है।

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  2. very-very thank Radha raman ji, samvedanshil sabad me bahud power hai,kas hum sabhi aisa hote.

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  3. प्रेरक, रोचक, भाउक संस्मरण।
    ..आपके ब्लॉग पर आकर खुशी मिली।

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