Wednesday, March 17, 2021

मन की हार - हार है , मन की जीत - जीत


जब तक अर्थ है - कुछ भी व्यर्थ नही होगा  । जिंदगी की भाग दौड़ इसी अर्थ के इर्द गिर्द मंडराती रहती है । येे  सुबह बिस्तर से अलग होने और शाम को विस्तर से चिपकने तक - सभी कार्य इसी के अनुरूप होते है । संक्षेप में कहें तो जीवन अर्थ के बिना अर्थहीन ही है । जीवन को जीवंत बनाने के लिये जीवंत आत्मा आवश्यक है।

आत्मशक्ति ही हमे नियंत्रित करती है अन्यथा बिन लगाम घोड़ा की स्थिति हो जाएगी । कभी कभी आत्मा की आवाज न सुनना भी भारी पड़ जाता है । ऐसा ही तो हुआ था , जब मैंने दोस्त के बेटे की शादी जो 03-01-2021 को तिरुपति देवस्थानम सामूहिक गृह में होना निश्चित था , को मिस किया था । इसलिए कि परिवार के अन्य सदस्य शामिल हो जाएंगे । बाद में बहुत पछतावा भी हुई थी । 

उस दिन मैं 02692 एक्सप्रेस ( राजधानी स्पेसल ) को लेकर सिकंदराबाद से गुंतकल को आ रहा था । ट्रेन नार्मल ढंग से चल रही थी । कोई शिकायत या शिकवा नही था । ट्रेन नवांगी स्टेशन से गुजरने वाली थी , उसके दो ढाई किलोमीटर के पहले ही लोको के अंदर से एक जोरदार धमाके की आवाज सुनाई दी । हम किसी अनजान समस्या कोभाप  डर गए । उप लोको पायलट ने लोको का मुआयना किए , कहीं भी कुछ समस्या जैसी स्थिति नही थी। फिर भी मन न माना । 

किसी अनजान भय से आत्मा के अंदर कंपन होने लगी । ऐसा होने पर मुझे हमेशा ही कुछ समस्याओं से गुजरना पड़ा है । हो न हो कुछ तो कारण होंगे । अन्यथा विस्फोटक आवाज नही आती । मैंने यह सुनिश्चित किया कि अगले स्टेशन में ट्रेन को रोक , लोको की जांच करेंगे , और तत्पश्चात ही आगे बढ़ेंगे । 

नावनगी स्टेशन में ट्रेन को खड़ा किया । जब कि नॉनस्टॉप स्टेशन था । हम दोनों लोको निरीक्षण करने लगे । देखा कि होटल लोड के कनवर्टर से आग की लपटें निकल रही थी । हमारी अंदेशा सही साबित हुई । जैसे तैसे दो घंटे में आग को बुझाई गयी । ट्रेन के सभी रेलवे के कर्मचारियों ने आग बुझाने में अपने भरपूर सहयोग दिए । अगर ट्रेन नही रोका होता तो आग की बड़ी दुर्घटना से इनकार नहीं किया जा सकता ।

इस अनजान घटना ने ट्रेन के समय से चलने में बाधा तो बनी पर समय से ली गयी निर्णय ने अन्य जघन्य नुकशान से रेलवे को बचाए । इसके बाद जो हुआ ,वह मुझे बरबस सोचने के लिए मजबूर किया कि मैंने आत्मा की आवाज को क्यों दबाई ? 

हमे जीवन मे कई बार ऐसे मोड़ आते है जहां हम सही निर्णय से मुकर जाते है । दिल की बात जरूर सुननी चाहिए ।अगर दोस्त के बेटे की शादी में सपरिवार मैं भी शामिल हुआ होता तो ऐसी अनहोनी घटना में प्रत्यक्ष प्रमाण से बच सकता था और मेरी जगह कोई और होता था ।



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