Saturday, July 2, 2016

माँ बैष्णो देवी यात्रा - 2

मेरी जीवन संगिनी और बाला जी ।  कटरा स्टेशन 
कटरा स्टेशन में हमने कुछ तस्वीर अपने मोबाइल में कैद किये । हमें रेलवे को बधाई देनी पड़ेगी जिसने इन खूबसूरत कश्मीर के वादियो में पहाड़ो को काट छांटकर एक सुन्दर स्टेशन का निर्माण जो किया है । मई का महीना गर्मियों भरा होता है फिर भी चारो तरफ हरियाली थी । मौसम तो बादलो से ढका जैसा । नरम सी सर्दी लग रही थी । प्राकृतिक की सर्दी कृतिम सर्दी से लाखगुना अच्छी लग रही थी । जिधर देखो उधर ही नजरो को सिर्फ व् सिर्फ हरियाली  ही दिखाई दे रही थी। स्टेशन से बाहर आते ही पहाड़ो के ऊपर माँ वैष्णो देवी जी का मंदिर दिखाई दे रहा था । जाने आने के रास्ते नजर आ रहे थे । बाहर कोई ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं था । दर्शनार्थियों को यात्रा के पूर्व पंजीकरण की पर्ची लेनी पड़ती है । जो पूर्ण रूप से कम्प्यूटरिकृत है । यह सुविधा रेलवे , बस स्टैंड और जहाँ से यात्रा शुरू होती है ( वाणगंगा ) में उपलव्ध है । हमने अपने  पंजीकरण यही से करवा लिए क्यों की हम रेलवे स्टेशन में मौजूद थे । इस प्रक्रिया से सभी को गुजरना पड़ता है । इसमे हमारे नाम , स्थान को हमारे पिक के साथ रेकॉर्ड किया जाता है और एक टिकट व्यक्ति को दी जाती है । इस कार्ड की जरुरत यात्रा के दौरान कई जगहों पर पड़ती है । आवश्यकता के समय सुरक्षाकर्मियों को दिखानी पड़ती है । इसे सुरक्षा कर्मी मंदिर में प्रवेश करने के पहले ले लेते है । कटरा स्टेशन भाग दौड़ की शहरी जिंदगी से बिलकुल शांत लगा । साधारण भीड़ । एक झुण्ड में सिमटे घर ।

हम स्टेशन से बाहर निकले । इस अनजान शहर में एक आश्रय की जरुरत थी । कोई जान पहचान वाला नहीं था । अतः होटल के कमरे लेना जरुरी था । सामने रोड पर एक दलाल घूम रहा था । हमें खड़े देख पास आया और पूछा - साब रूम चाहिए क्या ? हमने हामी भरी तो उसने कहा - मिल जायेगा । ये सी या नार्मल ? कटरा का वातावरण बिलकुल ठंढा था अतः वातानुकूलित का प्रश्न नहीं था । हमने कहा - नार्मल रूम चलेगा । किन्तु साफ सुथरा रहनी चाहिए । उसने कहा - आप चल कर कमरा देख ले । पसंद आये तो रहे अन्यथा दूसरे जगह ले चलूँगा । 1200/- लगेगा । हमने कम कराये तो हजार पर राजी हो गया । उसने किसी को फोन किया और एक कार सामने आकर रुकी । हमें बैठने का इशारा हुआ । हम लोग कार में बैठ गए । करीब 2 मिनट में कार एक होटल के पोर्टिको में प्रवेश किया । जिसका नाम होटल टुडे है जो रेलवे स्टेशन रोड में स्थित है । हमने प्रोग्राम के अनुरूप रुम का मुआयना किया । रूम बिलकुल अच्छे थे । हमारी सहमति के बाद कागजी प्रक्रिया पूरी हुई । होटल का मैनेजर हमारी आईडी नहीं पूछा । जबकि हम तैयार होकर चले थे । हमने हमारे कमरे में प्रवेश किया जो ग्राउंड फ्लोर पर ही था ।

हम दिन चर्या से निवृत होकर तैयार थे । नास्ते का समय था । हमने होटल से ही आलू पराठे और दही लिए । आदत तो नहीं था पर स्वाद अच्छे लगे । आज आराम करने का प्रोग्राम था  चुकी कोई थकावट तो नहीं थी । इसीलिए हमने आज ही मंदिर जाने के प्रोग्राम तय कर ली । होटल वालो ने भी बताया  की अभी जाने से शाम तक वापसी संभव है । यहाँ के होटलो में एक समानता है । सभी के पास अपनी कार है । ये यात्रियों को मुफ़्त में रेलवे स्टेशन या वैष्णो देवी यात्रा की शुरुवाती द्वार वाणगंगा तक  ले जाते है और वापस भी ले आते है । तो हमने पूर्णतः आज ही मंदिर जाने का निश्चय कर लिया ।

बालाजी होटल के मुख्य द्वार पर ।


होटल का मैनेजर अपने कार के ड्राईवर को निर्देश दिया की साहब को वाणगंगा तक छोड़ आये , जहां से माँ के मंदिर के लिए यात्रा शुरू होती है । उसने वही किया । हम वाणगंगा के नजदीक बाजार में थे जहा कार ड्राईवर ने हमें छोड़ी थी । चारो तरफ प्रसाद की  दुकाने लगी हुई थी । दुकान दारो ने अपने दलाल छोड़ रखे थे ।  हमें अपने तरफ आकर्षित करने लगे । हम पहली बार आये थे अतः प्रसाद खरीद लिए । मुख्य द्वार की तरफ चल पड़े । एक छोटा भेंडर आया और चांदी  के सिक्के मातादी के तस्वीर वाले लेने  के लिए विवश करने लगा । हमने अपनी अनिक्षा जाहिर की । वह गिड़ गिड़ाने लगा । साहब ले लो । यही हमारे जीविका  का साधन है । सौ रुपये में 6 ले लो । हम अनजान सा आगे बढ़ते रहे । वह मायूस हो गया और बोला - साहब आप लोग दूसरे जगह हजारो खर्च कर देंगे पर गरीब की भलाई के लिए कुछ नहीं सोंचते । बात पते की थी । कटु सत्य । मेरे मन में उसके प्रति सहानुभूति जगी और मैंने न चाहते हुए भी 6 चांदी के सिक्के जिस पर माँ की तस्वीर छपी थी ले लिए । उसके मुख पर मुस्कराहट खिल  पड़ी । 

कुछ आगे बढ़ते ही पालकी और घोड़ो के मालिको से सामना हुई । वे भी घेर लिए । श्रीमती जी शुगर की मरीज है । पैदल यात्रा संभव नहीं था । घोड़े या पालकी जरुरी था । मुझे भी पैदल की आदत नहीं है । पालकी वाले 5 हजार और घोड़े वाले ने 1850/- की मांग रखे वह भी प्रति व्यक्ति । हेलीकॉप्टर से जाने का प्लान था किन्तु इसकी बुकिंग 2 माहपूर्व करनी पड़ती है । करेंट संभव नहीं था । माँ की यात्रा , और पॉकेट पर बल न पड़े अतः हमने घोड़े की सवारी का निर्णय किया । बहुत जद्दो जहद के बाद 1500/- प्रति व्यक्ति पर जाने और ले आने की बात बनी । घोड़े पर सवार होने के लिए जगह जगह प्लेटफॉर्म बने हुए है । घोड़े की सवारी भी अजीब लगी । घोड़े के टॉप और हमारे शरीर में उछल कूद आनंददायी थे पर यात्रा के बाद कमर को दर्द का अहसास हुआ । वाणगंगा से मंदिर की चढ़ाई 13 किलोमीटर है । इसी रास्ते में अर्धकुआरी माता जी का मंदिर है । जिनका दर्शन करने के लिए एक गुफा से गुजरना पड़ता है । जो सभी के लिए उपयुक्त नहीं है । घोड़े से यात्रा करने के समय यह मंदिर बाईपास हो जाता है । अगर मन में इच्छा हो तो घोड़े के मालिको से कह , यहाँ भी जाया जा सकता है । चढ़ाई के रास्ते पक्के है । जगह जगह शेड भी मिल जाते है । छोटे छोटे दुकान भी मिलते है। रास्ते में पड़ने वाले दुकान बहुत पैसे वसूल करते है क्योंकि उन्हें अपने सामान घोड़े के माध्यम से लाने पड़ते है ।  वैसे तो गर्मी का मौसम था किन्तु सुबह से धुप नदारद थी  । उस पर यात्रा के दौरान एक दो जगह बारिस भी हुई जिससे मौसम खुशनुमा हो गया था । लोग पेट के लिए क्या क्या न करते है । हम घोड़े पर बैठे थे और उनका मालिक उन्हें पकड़ कर निचे चल रहे थे । यात्रा के दौरान जगह जगह चेक पोस्ट मिले ।

तीन साढ़े तीन घंटे के बाद हम मंदिर के क्षेत्र में प्रवेश कर गए । घोड़े वाले अपने घोड़े के साथ आराम गृह में चले गए और अपना मोबाइल नंबर देकर गए । जम्मू कश्मीर में प्रीपेड मोबाइल ( बाहर राज्य के ) काम नहीं करते है । पोस्ट पेड कार्य करते है । मेरे पास पोस्टपेड था । मंदिर के प्रांगण में जुत्ते चप्पल मोबाइल बेल्ट या कोई भी सामान लेकर जाना पूरी तरह से प्रतिबंधित है । हमने अपने सभी सामान शिरीन बोर्ड के लॉकर में जमा कर दिए । मंदिर के अंदर जाने के पूर्व हमारे पंजीकरण कार्ड सुरक्षा कर्मियो ने ले लिए । दर्शन के लिए ज्यादा समय नहीं लगा । माताजी का दर्शन आराम से हो गया ।

बाहर निकलने के वक्त मिश्री के पैकेट और एक चांदी के सिक्के प्रसाद के रूप में मिले । करीब तीन बजते होंगे । बाहर शिरीन के भोजनालय में भोजन करना पड़ा । पहाड़ियों को काट कर सरकारी या प्राइवेट इमारते बनी है ।  इतनी ऊँचाई पर जहाँ सामग्री को लाना काफी कष्टकर और महंगा है , फिर भी पूर्ण सुविधा उपलब्ध है । हाँ एक बात जरूर है कि किसी आपदा के समय राहत कार्य बहुत कठिन साबित हो सकता है । कोई भी यहाँ ज्यादा ठहराना नहीं चाहेगा । माताजी के दर्शन अधूरे समझे जाते है यदि आपने भैरव बाबा के दर्शन नहीं किये । भैरव बाबा का मंदिर करीब 2 किलोमीटर ऊपर है । हमने लॉकर से सामान लिए और भैरव बाबा जी के लिए रवाना हो गए । ये एक छोटा सा मंदिर है । इसके समीप एक गैलरी है । जहाँ से निचे के नजारे अदभुद दिखाई देते है । यहाँ हमने भैरव बाबा के दर्शन किये । आकाश में बदल घिर आये थे । कभी भी बारिस आ सकती थी । लौडस्पीकर में उदघोषणा हो रही थी कि भक्तो से निवेदन है कि यहाँ न ठहरे । कृपया वापसी के लिए तुरंत प्रथान करें क्योंकि मौसम अच्छा नहीं है । अब हम भी घोड़े से वापस चल दिए ।

चढ़ाई के वक्त तकलीफ महसूस नहीं हुआ पर पहाड़ के ढलान पर घोड़े की दौड़ तकलीफदेह लगी । करीब 7 बजे तक वाणगंगा आ गए । हमने माता के दरबार में फिर आने के कामना के साथ माँ से दुआ मांगी और एक होटल में जाकर भोजन किये । होटल मैनेजर को फोन किये । उसने अपनी कार भेजी और हम अब होटल के प्रांगण में थे । कोई भी यात्रा सुखदायी नहीं होती पर हमारे अदम्य साहस और आस्था वहां खीच  ले जाती है । सुख की घरेलु व्यवस्था सभी जगह नहीं मिलती है । हमें अपने को यात्रा के बिच आने वाले अड़चनों से सामंजस्य बनाये रखना पड़ता है । यह भी सत्य है कि यह सबके लिए नसीब नहीं होता ।
आगे की कथा भाग - 3 में । 

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