Monday, September 23, 2013

पूर्वाभास

हमारे जीवन में सोते वक्त स्वप्न और जागते वक्त कल्पनाएँ -प्रतिक्षण कुरेदती  रहती है । कोई स्वप्न देखना नहीं चाहता  , तो कोई कल्पना मात्र  से भी डरता है । फिर भी हमारे हाथ पैर इन्हें साकार करने हेतु प्रयत्नशील रहते है । हमारे मष्तिष्क की उपज है ये  स्वप्न और कल्पनाएँ । स्वप्न में भयावह दृश्य हो  सकती है , आनंदायी भी और उमंग भरी भी ।  पर कल्पनाएँ  जागरुक और सुखमय ही कर जाती  है । 

स्वप्न और कल्पनाएँ दोनों  मिलकर एक हकीकत को रंग देती है । स्वप्न और कल्पनाएँ निजी सम्पदा है । निजी प्रयत्नों से कामयाब होती है । बोतल की नीर , बोतल से ही निकलेगी , घड़े से नहीं । दुनिया में बहुत कम लोग होंगे जिन्हें स्वप्न या कल्पनाओ की अनुभूति न हुई   हो । कभी - कभी ये सच का रूप भी  लेती है । मंथन से अमृत निकल सकता है , तो जिज्ञासा से सच्चाई क्यों नहीं ? तभी तो कहते हुए सुना गया है -जिन   खोजा तिन पाईया ।  

जब स्वप्न और कल्पनाओ की बातें हो ही  गयी तो एक उदहारण भी प्रस्तुत है -
           मै वाड़ी में  था और मुझे उस  दिन शिर्डी साईं नगर एक्सप्रेस लेकर गुंतकल आना था । दोपहर को भोजन के उपरांत  सो गया । मुझे एक स्वप्न आया कि  मै गेंहू पिसवा  रहा हूँ , पर गेंहू गीला हो जाता था । सो कर उठने के बाद परेशान हो गया ।दिमाग चलायमान हो चूका था ।  किसी अशुभ घटना के संकेत थे क्युकी कहते है शिरडी में हैजा की बीमारी के समय , साईं बाबा जी ने चाकरी में गेंहू की पिसाई की थी और औरतो से कहाकि  गाँव के चारो ओर सीमा पर छिड़क दें । सूखे आटा को सीमा पर छिड़कने से हैजा से मुक्ति मिली थी । पर यहाँ तो आटा गिला हो रहे थे ?

ड्यूटी में पौने पांच बजे शाम को ज्वाईन हुआ  । मिसेस जी का  फ़ोन काल आया । उन्होंने सूचना दी कि मिनी के सास की मृत्यु हो गई  , जो बनारस में ब्रेन फीवर की वजह से भरती थीं । मिनी मेरे बहन की बड़ी बेटी है ।  सूखे आटे कि जगह यह है गीली आटे का स्वप्न । स्वास्थ्य के वजाय अस्वस्थ सूचना ।  जी ऐसी कितने पूर्वाभास हमें होते रहते है । सिर्फ हम उन्हें हल्के में ले लेते है । अगर उनकी समीक्षा की जाये , तो जरूर निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है । फिर भी जरूरी नहीं कि आप मुझसे सहमत हों । 

8 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आप का वहाँ हार्दिक स्वागत है ।

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  2. सपने के कारण और फल पर अभी कोई वैज्ञानिक विश्लेषण उपलब्ध नहीं है
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  3. ऐसा अक्सर देखने को मिलता है ।

    मेरी रचना :- चलो अवध का धाम

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  4. मन आशंकित हो जाता है कई बार .... और ये सच भी जाता है ...

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  5. कई बार मन में कुछ शंका किसी भी वजह से आ जाती है ओर वो घटना घटित भी हो जाए तो ऐसा विश्वास बड जाता है ... बाकी सपनों का विश्लेषण रोमांच तो देता है ...

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