Saturday, August 22, 2026

प्रतिबंध

   ईश्वर ने हमे  एक अद्भुत जीव की श्रेणी में निर्माण किये है । जो अपने ढंग से जीवन यापन या सब कुछ कर सकता है । समाज मे कई तरह के लोग होते है और सभी की पहचान और सोंच विभिन्न  प्रकार की होती है । 

जब ऐसी बात चल ही गयी तो एक वाक्या याद आ गया । कुछ वर्षों की बात है । गोआ और समुंद्री बीच । अरब सागर की लहरे उछाल मार रही थी और उन लहरो के बीच चार हसीन युवतियां - जिनके नाम - सुधा , पुष्पा , स्वाति और शिप्रा था - ठहाके और अठखेलिया करती हुई ,  पानी को अंजुली में भर कर - एक दूसरे के ऊपर छिड़क छिड़क कर मस्ती में मग्न टहल रही थी ।समुद्र ऐसे उछाले मार रहा था जैसे वह भी उनके ध्वनि में ध्वनि मिला रहा हो । अजीब दृश्य । भगवान भी तरस जाए । 

 आसमान की किरणें सिर को छेद अपनी उपस्थिति की परिचय दे रही थी । फिर भी मस्ती में लीन युवतियों को सूर्य को रोशनी की छाया -  ऐसे स्पर्श कर रही थी जैसे कोई प्रेमी अपने प्रेमिका को चूम लेने का प्रयास करता हो ।

इसी बीच एक सहेली जिसका नाम पुष्पा था , सभी को इशारा करते हुए बोली - यार चलो थोड़ी देर उस बृक्ष के नीचे बैठते है  बहुत गर्मी है और सभी सहेलिया उस बृक्ष की ओर चल पड़ी । सभी के कपड़े जल से भींगे हुए थे । शरीर की बनावट प्रत्यक्ष दिख रहे थे । ईश्वर ने भी क्या चीज बनाई है एक औरत , जो समयानुसार सबल भी है और निर्बल भी ।बेचारा समुंदर देखते रह गया । कितना आनंदित था वह ।

समुंदर के किनारे वह  बृक्ष भी अपने को धन्य कहते नही थका ।  औरत एक ऐसी प्राणी है जिसके संपर्क में सभी रहना चाहते है । तभी एक सहेली  जिनका नाम सुधा था , अपनी मधुर वाणी से सभी को सम्मोहित करते हुये बोलीं  - यार कोई आप बीती तो कोई सुनाओ । समय भी व्यतीत होगा और मनोरंजन भी ।

कोई आपबीती कहानी हो तो बड़ा मजा आएगा - शिप्रा ने गुदगुदी भरे शव्दों में कहा । 
बिल्कुल सही - स्वाति ने समर्थन किया । फिर सबसे पहले किसकी पारी ? - सुधा ने टोकते हुए कहा । इसमे कौन सी लड़ाई है यार , तुम ही कहो न । मिस्टर से जुड़ा कोई किस्सा - पुष्प ने डिंग भारी । बाकी सभी ने हा हा हा सुधा ही कहेंगी । हम लोगो की सीनियर भी है समर्थन किया । 

सुधा इनकार न कर सकी । सभी सहेलिया जानती थी कि सुधा की शादी हुए बहुत दिन हो चुके है और पर्सनल अनुभव भी बहुत होंगे ।
ठीक है मैं ही शुरू करती हूं सब लोग ध्यान से सुनना -सुधा ने कहा ।
Ok की ध्वनि दूसरी ओर से गुंजी ।

तो बात उस समय की है जब मेरे पति हैदराबाद में रहते थे और मैं यहाँ । मेरी सुंदरता चरम पर थी । कौन होगा जो बिन देखे रह जाये जब रास्ते से बाजार या कहीं और जा रही हूँगी । 

किन्तु ये सब मेरे पति को नामंजूर था । वो नही चाहते थे कि कोई मेरी पत्नी को गंदी नजरो से देखे । सुधा कुछ समय के लिए अपने शव्दों को विराम दे । गहरी सांसें खींची । 

फिर क्या हुआ यार - शिप्रा ने टोका ।
इसीलिए वो ऑन लाइन खरीददारी करते थे और सभी आवश्यक बस्तुओं को मेरे पते पर भेज देते थे । घर के अंदर सभी चीजों का स्टॉक भरपूर था । समझ में नही आता था कि अगले आने वाला समान को कहां रखु । 

मैं बार बार मना करती पर वो सब कुछ अनसुनी कर देते । समझ मे नही आता था कि इन्हें कैसे समझाऊ । फिर क्या था एक दिन मजाक मजाक में मैंने कह दिया कि लगता है बैंक एकाउंट अब सीज़ करना पड़ेगा । क्यों की हमदोनो की एक जॉइंट एकाउंट थी ।

उन्होंने हंसते हुए कहा- यार आप सीज़ करो या फ्रीज । मैं ख़रीददारी करके समान भेजता रहूंगा । मैं हैरान हो गयी । पूछी- ये कैसे ? 
आप ही सोंच कर बताओ - उन्होंने कहा । और सोंचने के लिए 24 घंटे का समय भी दिए । मैं थोड़ी स्तबध रह गयी । 

मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी जानने की । फिर प्यार से पुचकारते हुए पूछी - कहियर जी । कैसे ये पॉसिबल है । वैसे मुझे ऑन लाइन की खरीददारी का अनुभव नही था । मेरे हठ कर बाद वो तैयार तो हुए किन्तु एक शर्त पर । 

कौन सी शर्त । किसी और ...........की कुछ तो नही ? स्वाति ने चिकोटी की लहजे में कहा ।
हो सकता है .....किसी बंधन से मुक्ति की - पुष्पा ने कहा जैसे आग में घी डाल दी हो । सभी को हंसी आ गयी । 

जल्दी बाते पूरी करो सुधा अभी तो स्वाति की चटपटी भी सुननी है - शिप्रा हंसते हुए बोली । स्वाति शिप्रा को ओठो बिदकते हुए बोली । 

सुधा ने आगे कहा कि -
उन्होंने एक शर्त रखी कि अगर मैं हार गई तो एक चीज देना होगा जो मैं मांगूगा । मरता क्या नही करता । मुझे उत्तर जानने की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी । आखिर कौन सी वो चीज है ? ।

एक सेकेंड के लिए सुधा रुकी और अपने सहेलियों से ही पूछ बैठी - क्या आप लोग बताएंगी की कैसे खरीदते और मेरे हार स्वीकार करने के बाद उन्होंने क्या मांगी । 

सभी एक दूसरे की मुंह देखने लगी । क्षण भर के लिए सोंच की मुद्रा में । यार छोड़ो टेंशन मत दो । बताओ उत्तर । पुष्पा ने कहा ।
 तो सुनो पतिदेव की वो पालिसी जिससे वो खरीदारी करते .......वो है........COD कैश ऑन डिलीवरी । 
वाह क्या पति मिला है यार सुधा । जबाब नही । सभी स्तब्ध । किसी के दिमाग मे  ये ख्याल नही आया । पुष्पा ने कहा । 

अच्छा सुधा अब तो तुम हार चुकी थी शर्त के अनुसार उन्होंने क्या मंगा । हनीमून या और कुछ ... स्वाति मजकिये भाव से पूछ बैठी । 

मैंने कहा - कुछ नही यार । वेरी सिंपल । मेरे एकाउंट पर फ्रीज़ की प्रतिबंध को हटा लीजिये । सभी की हंसी गूंज उठी । वाह क्या पति मिला है यार । हार कर भी जीत गया । 
 ( साभार- gorakhnathbalaji.blogspot.com )


Saturday, August 1, 2026

सर्प दंश

सर्प सर्प और सर्प । ये सुनते ही देह में सिहरन आ जाती है । कोई भी ऐसा शख्स नहीं होगा जो सर्प से न डरता हो । कोई भी इंसान सर्प के सामने नहीं आना चाहता । वजह साफ है की इसके डंस से सभी भयभीत हो जाते है । तो फिर क्या सर्प डंस ने मारे तो क्या करे ? यही तो उसके हथियार है जिसके सहारे वह अपनी रक्षा करता है । सर्प के पास कोई हाथ तो होती नहीं । ये कई किस्म के होते है । जहरीले से लेकर प्यारे । शायद ही मनुष्य को सभी किस्मों की जानकारी हो । सर्प का निवास सभी जगह है । चाहे पानी या जमीन हो या पेड़ पौधे या घर द्वार । जमीन या पेड़ या घरो में रहने वाले सर्प बहुत ही नुकसान देह होते  है । 

वैसे तो सर्प  के बारे में पूरी दुनिया में कई किस्से मशहूर है   किताबो से ज्यादा चलचित्र में । नाग और नागिन पर आधारित चलचित्र मनोरंजन के प्रमुख साधन है । चलचित्र में नाग या नागिन द्वारा अपने दुश्मन से बदला लेने की कला सबको चकित कर देती है । मन में ये दृश्य ऐसे समा जाते है जैसे सच में  भी यह संभव है । चलचित्र की कहानिया सही हो या न हो पर  वास्तविक जीवन में कुछ घटनाये गहरी दर्द दे जाती है । कुछ घटनाये ऐसी होती है जिन्हें याद करते ही शारीर में सिहरन दौड़ जाती है । मैं खुद और मेरे परिवार के लोग कई बार सर्प से सामना कर चुके है ।  यहाँ तक की एक बहुत ही पुराना सर्प मेरे घर में वर्षो से निवास कर रहा था और इसकी भनक किसी को नहीं । भगवान की दया है की कोई नुकशान नहीं झेलने पड़े ।

एक बार तो एक सर्प दो बार मेरे पैर से दब गया जब मैं आधी रात को बाथ रूम में गया था । इसकी जब अहसास हुई तब तक सर्प गायब हो चूका था । घर के अंदर सर्प का गायब होना कई संदेह उत्तपन्न किया । हो न हो वह कही छुप गया है या कोई गृह देव हो जैसी  भ्रांतिया भी मन में घर करने लगी थी । लेकिन घर के अंदर की छुप ज्यादा दिनों तक नही टिकती है एक न एक दिन बाहर आ ही गयी । हुआ यूँ की सर्प महाशय एक सप्ताह बाद फिर बाहर निकले । पत्नी की नजर पड़ गयी क्यों की सर्प महाशय किचन से निकले । शाम को सात बज रहे होंगे । हो हल्ला मचा । तभी पत्नी जी ने देखा की वह किवाड़ के पास के एक छिद्र में घुस रहा है । छिद्र इतना बडा था कि देखते ही देखते वह सर्प पूरा अंदर चला गया । अब कुछ करना मुमकिन नहीं था । पत्नी जी को एक उपाय सूझी । घर में ही बालू और सीमेंट था । उन्होंने तुरंत घोल बनायीं और उस छिद्र को भर दिया । आज तक वह छिद्र बंद है । सर्प कहाँ गया किसी को नहीं पता ।

सर्प का बार बार घर के पास निकलना खतरे से खाली नहीं होता । बहुतो को कहते सुना गया है की जहाँ सर्प होते है वहाँ सुख शांति और धन की कुबेर होते है । ये कहाँ तक शुभ है कह नहीं सकता । ये सब भ्रांतिया हो सकती है । पर ये सत्य है की हमारे घर में और घर के आस पास सर्प निकलते ही रहते है । आज तक हमें कोई इससे असुविधा नहीं हुई और न ही किसी प्रकार की कमी । सब ऊपर वाले की महिमा है । उसी ने सभी को बनाया है और वही सभी को समय पर बुला लेगा । इसमे कोई संदेह नहीं होनी चाहिए । ऐसा ही कुछ उस दिन भी हुआ था ।


सभी की आँखों में पानी ही पानी । औरतो का बुरा हाल था । शायद औरते दुःख को जल्द अनुभव करती है । पुरुष भी संवेदनशील होते है पर वे प्रकट नहीं होने देते । मेरी दूर की भतीजी थी भारती । वह पुरे परिवार के साथ मथुरा में रहती थी । उस समय वह सात या आठ वर्ष की होगी । घर के पिछवाड़े एक पुराने गवर्नमेंट ऑफिस का खँडहर था । उसके बगल में लाइब्रेरी । एक दिन की बात है । अपने मम्मी के साथ वह कपडे धोने के लिए बाहर नल पर गयी । कुछ समय बाद घर में बाल्टी के साथ वापस लौटी । घर में अँधेरा था । करंट भी नहीं थी । अचानक उसके पैर किसी मोटे चीज पर पड़ गयी । उसने उसे लकड़ी समझकर बिना देखे ही पैर से दूर धकेल दी । अरे यह तो एक लंबा सर्प था । सर्प गुस्से में भारती के  पैर में डंक मार दिया और फुर्ती से बाहर निकल गया ।

भारती  की नजर  उस सर्प पर  पड़ी । वह चिल्लाते हुए मम्मी के पास गयी और अपने पैर  को दिखाते हुए बोली - मुझे सर्प ने डस लिया है माँ । माँ तो माँ ही होती है । तुरंत अपनी बेटी को गोद में बैठा ली और पैर की मुआयना की । यह सच था । पैर में सर्प के डंस के निशान थे खून बह रहे थे । देखते ही देखते भारती के होस् शिथिल पड़ने लगे । शोर गुल सुन आस पास के लोग भी एकत्रित हो गए । जिसको जो सुझा सभी ने प्रयत्न जारी रखा । धीरे धीरे भारती बेहोश हो गयी । और वह भी क्षण आये जब एक माँ को सब कुछ लुटते हुए दिखाई दिया । सभी प्रयत्न असफल रहे और भारती मृत घोषित कर दी गयी । पुरे परिवार को गम ने अपने आगोस में ले लिया था । भारती के पिता के आँखों की अश्रु रुकने का नाम नहीं ले रही थी । भारती अपने माँ बाप की एकलौती वेटी और एक गुड़िया जैसी सबकी प्यारी थी ।

कहते है लाख बैरी क्यों न हो जाये पर जिसे वह नहीं मार सकता उसे कोई कैसे मारे । अब अर्थी के अंतिम संस्कर की बारी थी । कहते है कुँवारे को आग में नहीं जलाते । अतः दो ही विकल्प थे मिटटी में दफ़न या नदी में विसर्जन । विसर्जन पर ही सबकी सहमति बनी । सभी लोग अर्थी विसर्जन के लिए अर्थी को लेकर  यमुना नदी की ओर चल दिए । रास्ते में एक अनजान व्यक्ति मिला और पूछा - किसकी अर्थी है ? किसी ने पूरी बात बता दी । सर्प डंस की जानकारी मिलते ही उस व्यक्ति ने अर्थी को रोक लिए और कहा अर्थी को निचे रखें । सभी ने उसकी बात मान ली डूबते को तिनके का सहारा । उस व्यक्ति ने कड़ी मेहनत की घंटो तक । क्या  किया , इसे उजागर नहीं करना ही उचित है । और किसी ने भी नहीं की थी । कुछ घंटो बाद भारती के शरीर में हलचल हुए , पैर , हाथ और आँखों की पलक खुलने  लगे । सभी के होठो पर मुस्कान और आँखों में खुसी के आंसू निकल आये । अदभुद नजारा था मथुरा नागरी में । जहाँ कभी  कृष्ण की बंसी गूँजा करती थी । कालिया नाग अत्याचार किया करता था । फिर क्या था भारती उठ कर बैठ गयी और वह व्यक्ति अपने रास्ते चला गया । उसने कोई आता पाता नहीं बताई ।

जी हाँ । मुझे मालूम है आप विश्वास नहीं करेंगे । न करे । अपनी अपनी मर्जी । इतना तो सत्य है जिन खोजा तिन पाईया । आज भारती शादी सुदा है और दो बच्चों की माँ । उसे सर्प से बहुत डर लगता है किन्तु मृत्यु से नहीं इसीलिए तो वह बार बार कहती है जिंदगी दो दिनों की है जिलो शान से । मृत्यु किसी ने नहीं देखी । किन्तु वह तो मृत्यु से वापस आई है । वह जीवन को ख़ुशी से जीने में ही विश्वास करती है ।
जीवन जीने के लिए है । मृत्यु तो मरने नहीं देती ।

एक लघु कथा - पिघलती ममता

मुंशी प्रेमचंद पुस्तकालय -अपने  आप में एक अलग ही महत्त्व रखता है । इस पुस्तकालय में  एक साथ  पचासों लोग  बैठ सकते है । शिप्रा एक विदुषी महिला  थी । सामाजिक , राजनितिक , आर्थिक और देश -विदेश की समस्याओ में विशेष रूचि । इस पुस्तकालय के  सभी पाठको में बहुत लोकप्रिय । वह अपने एकलौते पांच वर्षीय पुत्र के  साथ नियमित पुस्तकालय में शरीक होती थी । बहुत ही मृदुल भाषी , शांत स्वाभाव वाली ।  उसका पुत्र भी सभी का प्यारा था । 

एक दिन हरीश ने उनके   पुत्र के सिर पर टोपी  रखते हुए -" टोपी " कह  दिया । शिप्रा के मुख की रेखाए तन गयी । माँ का कोमल दिल , पुत्र के प्रति इस्तेमाल  विशेषण के शव्द से आहत हो गया ।  मर्माहत सा टोपी को दूर फेंकते हुए ,पुस्तकालय से बाहर निकल  गयी । हरीश समझ न सका ? सन्न रह गया । समझ नहीं पाया कि उससे कौन सी गलती हो गयी   है । वैसे टोपी सिर की शोभा और  इज्जत बढाने वाली वस्तु  है । पैर पर थोड़े ही रखी जाती है ? एक माँ की ममता को ठेस पहुंचे , ऐसी  हरीश की इच्छा नहीं थी , महज प्यार से कह दिया था । एक इत्तेफाक था । 

पुस्तकालय में शिप्रा की उपस्थिति दिन प्रतिदिन कम होने लगी । सभी को उसकी कमी खलने लगी थी  । हरीश ने तय किया कि अवसर मिलने पर शिप्रा से गलती के लिए खेद प्रकट करेगा । वह अवसर की  ताक में था । आज पुस्तकालय के सभागार में एक समारोह का आयोजन किया गया था । शायद पुस्तकालय के एक  वार्षिक मैगजीन की लोकार्पण होने वाली थी । हरीश भी उपस्थित था । मैगजीन को आम पब्लिक हेतु लोकार्पित  किया गया । हरीश मैगजीन का मुखपृष्ट देख आश्चर्य चकित हो गया -" मुखपृष्ट पर शिप्रा के पुत्र की तश्वीर छपी थी । "

भीड़ में उसे शिप्रा दिखी । क्षमा हेतु इससे अच्छा अवसर और क्या हो सकता है  । हरीश ने तपाक से कहा - " आप एक श्रेष्टतम माँ है ।" और शिप्रा कुछ कहे , तब - तक वह  आँखों से ओझल हो गया । एक माँ का कोमल मन हर्षित हो उठा ।  शिप्रा के मन में अमृत का संचार हो चूका था । एक माँ की ममता पिघलने लगी थी । वह पुस्तकालय फिरसे गुंजित होने लगा । 

एक शब्द कडुवाहट ,नफ़रत और  प्यार  को  फ़ैलाने के लिए काफी होते है । अंतर उसके उपयोग में है  । इसकी पीड़ा सभी नहीं , कोई माँ  ही समझ सकती  है । 

Friday, July 31, 2026

क्या स्वपन भी सच्चे होते है ?

                                                                
     मै वाडी से २१६४ एक्सप्रेस आज ( तारीख -०२-१२-२०१० ) आने वाला था.मै वाडी लोको चालक आराम गृह में गहरी निद्रा में सोया हुआ था.अतः सुबह ०६ बजे कॉल बॉय आकर मुझे उठाया क्यों की ट्रेन राईट टाइम चल रही थी.

      मै उठ तो गया , किन्तु किसी गहरे स्वप्न में खोया था.पूरा सीन याद नहीं आ रहा है ,पर आखिरी वाक्य याद है--वह यह की-मुख में राम , बगल में छुरी. जैसा की बिदित है और मेरे साथ होता आया है ,इस लिए मै इस वाक्य की ब्याख्या करता रहा.पर कुछ नतीजे पर नहीं पहुंचा.

   पूरी तैयारी  और नास्ता वगैरह करके, ड्यूटी पर आ गया.ट्रेन समय पर आई और समय से वाडी छुटी.यात्रा होती रही .रायचूर आने पर ,मेरे सहायक लोको चालक श्री प,ज,खान ने एक मछुवारे को जो मन्त्रालयम रोड में रहता है को फोन किया और कहा की मुझे २ किलो मछली चाहिए ,तैयार रखो.

       मछली वाले ने मेरे लिए भी मछली लाने के लिए पूछा.मैंने नं कर दी क्यों की मै प्रायः ब्रिह्स्पतिवार को नॉन veg नहीं  लेता वैसे आज ब्रिह्सपतिवार ही है.ट्रेन नियत समय से मन्त्रालयम रोड आई  ( यानि साढ़े नौ बजे. ) हम अपने लोको की जाँच -परताल कर रहे थे,तभी मछली वाला दो पैकेट  के साथ,आ हाजिर हुआ.पहला थैला उसने मेरे सहायक को दी और दुसरे के साथ मेरे नजदीक आया और कहा सर ,ये मछली मैंने आप के लिए लायी है.देखिये सभी मछलिय जिन्दा है.ताजी की ताजी है.
       मुझे आज कौन सा दिन है का ख्याल नहीं रहा और मैंने उस मछली के पैकेट को लेकर लोको के अन्दर रख दिया .गुंतकल आने में डेढ़ घंटे की देरी थी .मेरे सहायक लोको चालक की मछली को मछुवारे ने काट और साफ़ करके लाया था. उसे घर जाकर बनाने भर का काम था.

        रास्ते में मुझे याद आया, कल मै घर पर नहीं रहूँगा क्यों की आज रात को कर्नाटक एक्सप्रेस काम करनी है.चलो मछली को साफ करके फ्रिज मै रखना पड़ेगा .दुसरे दिन  परिवार वाले खा लेंगे.जैसे ही काटने की बात मुझे याद आई,स्वप्न वाली वाक्य याद आ गई.---मुख में राम , बगल में छुरी.

        अर्थार्त अब  इस वाक्य की ब्याख्या मेरे  सामने प्रस्तुत थी.यानि मुख में राम= मै ब्रिह्स्पतिवार को नान-veg नहीं लेता क्यों की साईं बाबा ( शिरडी वाले ) को बहुत मनाता हूँ और बगल में छुरी =का मतलब साफ है ,मछली मेरे साथ है उसे छुरी से काट कर तैयार करने होंगे.

          मै अपने किये पर शर्मिंदा हुआ और साईं बाबा को मन ही मन याद कर क्षमा मांगी.घर आने पर पत्नी ने बैग को देखते ही मुझे बहुत कोसा.मुझे भरपूर फटकार मिली,उसने मुझे हिदायत देते हुए कहा है की आइन्दा ऐसी गलती न होनी चाहिए |  

          (नोट-जरुरी नहीं जो मुझे स्वप्न में दिखी वह सभी के साथ हो,और उनके भी स्वप्न सिद्ध हो,पर यह मेरी अपनी अनुभव है कारण करम अपने - अपने ) यह स्वपन भी सच्चे हुए. 

क्या कुत्ते भी आत्महत्या करते है ?

      मै आज २१६३ एक्सप्रेस काम करके अभी -अभी आया हूँ.मन में कुछ सुझा तो ब्लॉग लिखने बैठ गया .सोंचता हूँ -आदमी को आदमी नाम किसने पहले-पहले दिया. कुत्ते को कुत्ता क्यों कहा जाता है? बाघ को आखिर बाघ क्यों कहा जाता है ?मुर्गी को मुर्गी ही क्यों ?पौधों को तरह - तरह के नाम क्यों. हिरन को हिरन ही क्यों गधा क्यों नहीं ?  बगैरह -बगैरह.....इससे ऊपर यह की सभी का नामकरण ,सबसे पहले दुनिया में किसने किया ? उसके पीछे उसका मकसद क्यों और कैसा था ?
            मुझे तो नहीं पत्ता.पर एक बिस्वास जरुर है .क्यों की हमारे पूर्वजो ने इस नाम को वहन करके ,यहाँ तक लाये है.जिसे समझना ,न समझना मेरे ऊपर निर्भर करता है.इस तरह देखा जाय तो दुनिया में बहुत सी चीजे मिल जाएँगी जिन्हें हम अपने पुर्बजो के द्वारा लायी समझते है.और दिल से बिस्वास भी करते है.अगर नाम करन के पीछे कोई धारणा हो और किसी को कुछ मालूम हो तो मुझे भी बताने की कृपा करें. 
                  मै बिषय से दूर चला जा रहा था ,अब आये कुत्ते की बात करे.किसी को कुत्ता कहने से लोग क्या समझते है. फिर भी कुत्ते को लोग बड़े प्यार से पालते है.कुत्ता पालतू होते है.फिर भी इनके नाम को कुत्ता ,रखने के पीछे क्या मनसा रही होगी.?  आज हुआ यूँ की मेरे ट्रेन के निचे एक कुत्ता मर गया .कुत्ते का ट्रेन के निचे आना कोई नयी बात नहीं है.प्रायः ऐसा होता रहता है ,किन्तु आज जो हुआ ,वह बिलकुल अलग सा था.क्यों की वह कुत्ता लगातार सिटी बजने के बावजूद भी ,दोनों ट्रैक के बिच में खड़े हो कर  ट्रेन को देखता रहा और टस से मस नहीं हुआ.जब की ऐसा कभी नहीं होता है.कुत्ते का स्वभाव है की जरा सी आवाज हुई की भगा.अंत में मै यही सोंचता हूँ की क्या कुत्ते भी मनुष्य जैसा आत्महत्या करते है ?अगर हाँ तो क्यों ?
      

Saturday, July 18, 2026

Hindi Song - Kisi Raah Mein Kisi Mor Per - Lata Mangeshkar /Mukesh


लताजी को उनके जन्म दिन की बधाई हो.......

चैट कीजिये ।

मैं पत्नी को देखते ही मोबाइल के स्क्रीन को तुरंत बदल दिया किन्तु पत्नी को समझते देर न लगी । चैट कीजिये - वह बिना किसी संकोच के बोली । मेरी ख़ामोशी को भाप गयी। बोली - मुझे कोई ऐतराज नहीं है । आप तो स्वयं समझदार है । आप कोई गलती नहीं कर सकते । मुझे पूरा भरोसा है । ये कह कर न जाने क्यों फिर जिधर से आई थी उधर ही चली गयी । आज सूर्य पूर्व के सिवाय पश्चिम से उदय होता नजर आया । वह पत्नी जो चैट के नाम पर क्रोध करती और आग बबूला हो जाया करती थी वही चैट करने के लिए स्वतंत्र रूप से आजादी दे रही थी । मैं आश्चर्य चकित था । पत्नी जी फिर  चाय के प्याले के साथ उपस्थित हुई । मुझसे रहा न गया , बरबस साहस कर पूछ ही लिया । देवी जी आज कैसे खुश हुई कोई कारण ? चाय का प्याला मेरे सामने रखते हुए बोली - वही जयपुर वाली आप की बेटी । बहुत सुन्दर और रहन दार है । भगवान ऐसी ही बेटी सभी को दें । फिर एक क्षण के लिए रुकी और एक लंबी साँस लेते हुए बोलीं - भगवान भी कितना अन्याय करते है । कुछ न कुछ कमी सभी को देते है । काश उसे जबान दी होती । इतना कहने के बाद उसका गला  भर आया । मैं कुछ नहीं बोल सका बस निःशब्द हो खयालो में खो गया ।

ये उन दिनों की बात है । जब मैं एंड्राइड स्मार्ट फोन का इस्तेमाल शुरू किया था । नई यांत्रिकी थी । नेट में तैरना अच्छा लगता था । एक मुठ्ठी भर का  यंत्र काफी कुछ के लिए मदद गार  था । उस दिन मैं सिकंदराबाद रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म संख्या 10 पर बैठा था । राजधानी एक्सप्रेस लेकर जाना था । ट्रेन आने में देरी थी अतः समय वश व्हाट्सप्प पर टहल रहा था । देखा एक अनजान व्यक्ति का कुछ मैसेज वेटिंग में था । पढना शुरू किया तभी एक मैसेज डिस्प्ले हुआ । आप क्या कर रहे है । मैंने उस अज्ञात व्यक्ति की परिचय पूछा । जबाब मिला मैं लक्ष्मी देव हूँ जयपुर से । फिर कल मिलेंगे - कह कर , मैंने मोबाइल बंद कर दी । मेरी ट्रेन आ चुकी थी ।

दूसरे दिन सुबह सोकर उठा । आदत वस सबसे पहले मोबाइल नेट को देखना शुरू किया । देखा लक्ष्मी देव ने कई चुटकुले और पिक पोस्ट किये थे । पढ़ा और बहुत आनंदित हुआ । अनचाहे मन से रिप्लाई भी पोस्ट कर दी - अच्छे लगे । वैसे व्हाट्सप्प के कई दोस्त और ग्रुप है जिन्हें रोज  पढ़ते रहता हूँ । इस दौरान मैंने लक्ष्मी देव की टिप्पणी देखी जो इस तरह की थी ~ " जय जवान जय किसान जय चालक । आप की डयुटी एक फौजी से कम नही है । अच्छा लिखते है आप सब drivers भाईयो को सलाम । जिस वक्त हम अपने बिस्तरो मे दुबके हुये रहते है उस वक्त आप हमारे लिये पटरियो पर सघर्ष करते है और और रेल संचालन का परिपूर्ण रूप से करते है " टिप्पणी पढ़ कर मन गदगद होना स्वाभाविक था । जीवन में पहली बार किसी ने जय जवान जय किसान स्लोगन के साथ जय चालक शव्द को जोड़ा था ।

मेरी जिज्ञासा लक्ष्मी देव के बारे में जानने की हुई । मैंने एक दिन पूछा - आप क्या करते है । जबाब मिला ~ मैं हाउसवाइफ हूँ । मेरे पति व्यापारी है । मेरे कान खड़े हो गए । आज तक मैं जिस व्यक्ति को पुरुष समझ रहा था वह एक महिला निकली । कहानी यही ख़त्म नहीं हुई । एक पुरुष और महिला का आकर्षण सर्व बिदित है । फिर क्या था । दिनोदिन चैट का सिलसिला शुरू हो गया । इस दौरान हम दोनों एक दूसरे के बारे में काफी जान चुके थे । घर गृहस्थी          हो या पारिवारिक लोग  या सामाजिक तंत्र या स्थानीय शहर या पति पत्नी और  हमारे बच्चे सभी के बारे में हम दोनों को एक दूसरे के बारे में पूरी जानकारी हो चुकी थी । प्रतिदिन कोई न कोई एक नए विषय पर चैट होती थी ।कभी कभी पत्नी भी बगल में बैठे होने के नाते मैं क्या कर रहा हूँ को समझ जाती थी ।अतः  पत्नी को भी इस बात की जानकारी दे दी थी। पहले तो वह गुस्सा हुई पर नरम पड़ गयी जब उसे यह मालूम हुआ कि मैं लक्ष्मी देव को एक पुत्री के रूप में स्वीकार किया  हूँ  । और यह सही भी था क्योंकि कि लक्ष्मी देव और मुझमे स्वच्छ चैट ही होते थे । एक बार मैंने एक वीडियो सांग लक्ष्मी देवको भेजी । लक्ष्मी ने उसके गलत अर्थ लगाते हुए मुझे कोसे थे । उस समय मैंने उसे समझते हुए कहा था कि किसी चीज का अर्थ हमारे मानसिक सोच पर निर्भर करता है । गलत सोच गलत और सही सोच सही मार्ग पर ले जाते है । उसके बाद लक्ष्मी देव ने अपने गलती का एहसास की थी ।

चैटिंग के साथ ही हम दोनों के पारिवारिक रिश्ते भी सुदृढ़ हो गए । किन्तु कोई भी एक दूसरे को प्रत्यक्ष न देखा था न ही कभी मिला था । लक्ष्मी देव अपने परिवार में काफी खुश थी और कोई आभाव महसूस नहीं करती थी । सभी उन्हें प्यार करते थे । मैंने कई बार फोन पर बात करना चाही पर लक्ष्मी देव को ये पसंद नहीं था । मेरी पत्नी भी एब बार बात करने की इच्छा जाहिर की , पर बाद में फिर कभी कह कर लक्ष्मी देव मुकर गयी । उनके परिवार में एक दबंग थी उनकी एकलौती सास , जिससे काफी डरती थी । एक बार उन्होंने अपने घूँघट को नाक तक चढ़ा ली थी जिससे उनकी सास कुपित हो बड़ी मार मारी  थी । आखिर घर की मालकिन सास ही थी किसी भी मर्द की नहीं चलती थी । एक तरह से मेरा अनुभव ये कहता है कि जिस घर की मालकिन औरत होती है उस घर में झगड़े और कलह नामात्र के होती है । लक्ष्मी देव को कई बार सेल्फ़ी भेजने की विनती की पर वह इसे भी इंकार कर दी यह कहकर की लोग पिक का गलत इस्तेमाल करते है । मैंने भी कोई जिद्द नहीं की थी ।

हम दोनों की दिल्ली इच्छा थी की किसी जगह मिले । मैं जा सकता था पर लक्ष्मी देव जयपुर छोड़ कही नही जा सकती थी ।  कहते है समय बहुत बलवान होता है । जिसे चाहे मिला दे या अलग भी कर दे । किसी की वश नहीं चलता । मुझे किसी काम वश जोधपुर जाना था । लक्ष्मी देव से संपर्क किया और पूछा की अगर वो जयपुर में मिल सकती है तो मैं एक दिन के लिए जयपुर रुकने के लिए तैयार हूँ । जैसे मैंने लक्ष्मी देव की , उनके मुहं की बात छीन ली हो , वह तुरंत तैयार हो गयी । मुझे भो आत्मशांति मिली चलो अब उन्हें प्रत्यक्ष देख पाउँगा । आज तक केवल चैट और कल्पनाओ की आँख से ही देखता था । कभी भी वह सेल्फ़ी या कोई पिक भेजने से इंकार करती रही थी । अब सामने खड़ी होगी और हम खूब बात करेंगे । मन की दुविधा दूर हो जायेगी ।

मैं जयपुर पहुँच गया था । अपने होटल के कमरे में सपरिवार ठहरा था । पत्नी भी जल्द तैयार हो गयी थी। लक्ष्मी देव की आगवानी जो करनी थी । दस बजने वाले थे । हम सभी आतुरता से उनकी  इंतजार में बैठे थे । मैं बेचैन था क्योंकि अब तक मैं उसे औरत नहीं समझ सका था । मेरे दिमाग में एक ही बात घुसी हुयी थी कि ये कोई पुरुष ही है जो मुझे औरत के रूप में चैट कर ब्लैकमेल कर रहा है । इसकी पुष्टि भी आज हो जायेगी । उसने दस बजे तक आने की वचन दी थी । बार बार घडी पर नजर जा रही थी अब साढ़े दस बजने वाले थे । सब झूठ है । वह धोकेबाज है । वह नहीं आएगी । वह आप से चैट तक ही सम्बन्ध रखना चाहती है । पत्नी भी मायूस हो शव्दों की प्रश्न चिन्ह खड़ी कर दी । मैं भी अशांत समुद्री लहर सा चुप चाप सुनता रहा । तभी किसी के दरवाज़े को ठोकने की ध्वनि सुनाई दी । अन्मयस्क सा उठा , बेयरा होगा बुदबुदाया और दरवाजे की तरफ बढ़ गया । ग्यारह बजने वाले थे । दरवाजा खोला । सामने चार लोगो को खड़े पाया । एक गोरी सी खूबसूरत महिला एक जवान पुरुष और दो छोटे बच्चे । कुछ देर के लिए खामोश । क्या वही चैट वाली प्रोफाइल वाली औरत सामने खड़ी है ? पत्नी को आवाज लगाई  । इधर आना । वे लोग मुझे घूरते रहे या हो सकता है वे भी मुझे सही पहचानने की कोशिश कर रहे  थे । पत्नी बगल में आ खड़ी हुई थी । आप ही लक्ष्मी देव है ? मैंने औरत की तरफ अंगुली से इशारा करते हुए पूछा । जबाब के वजाय वह औरत झुक कर हम दोनों के पैर छु लिए । मुझे जबाब मिल चूका था । पत्नी ने उन्हें अंदर आने की अनुग्रह की । हमारे साथ वे लोग अंदर आ गए । हमने उन्हें सोफे पर बैठने का  आग्रह  किया और बगल में ही बैठ गए ।


अंकल ये है मेरी पत्नी लक्ष्मी देव और ये दोनों पुत्र विवेक और शिवांग । मेरा नाम विजय है । आप सभी से मिलकर ख़ुशी हुई । लक्ष्मी देव जी आप को कैसा लग रहा है। चैट तो दमदार करती है । मैंने बेहिचक अपने वाक्य कह दिए । लक्ष्मी देव बिलकुल शांत बैठी रही और अपने पैर की अंगुलियो को ध्यान से सर झुकाये देख रही थी । जी लक्ष्मी कैसी हो ? अब खुल कर बात करो न ? पत्नी ने सवाल किये । मम्मी बोल नहीं सकती - शिवांग ने कहा । क्या ? हम दोनों के मुख से ये शव्द निकले । जी अंकल ये सही है - विजय ने कहा । देखा लक्ष्मी के हाथ में एक नॉट बुक था । अपने पति की जेब से कलम निकल कर कुछ लिखने लगी और हमारे तरफ पलट दिया । लिखा था - सॉरी अंकल ये सही है । मैं बचपन से ही गूंगी हूँ । बोल नहीं सकती । मैं यह आप से छुपाये रखा । कृपया क्षमा करे । हमदोनो पति - पत्नी की आँखे भर आई । देखा लक्ष्मी भी रो रही थी । पत्नी खुद रोते हुए उसे चुप कराने लगी । आज हम जीवन में एक अजीब सच्चाई से सामना कर रहे थे जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी । अब समझ में आ गया था आखिर लक्ष्मी फ़ोन में बात करने से क्यों कतरा रही थी । हे भगवान आप ने बिन आवाज ऐसी खूबसूरत मूर्ती क्यों बना दी । लक्ष्मी साक्षात् दुर्गा की मूर्ती लग रही थी । बस कमी एक ध्वनि की थी । आप से चैट कर के लक्ष्मी बहुत खुश रहती है अंकल । मुझे सब मालूम था । मैंने चैट करने की अनुमति दे रखी थी । विजय ने कहा । मैंने पूछा - आप लोग मुझे पहले क्यों नहीं बताये की लक्ष्मी देव बात नहीं कर सकती ?  विजय ने कहा - अंकल लक्ष्मी आप की ब्लॉग बहुत पसंद करती है । एक लेखक  से चैट करके इसे गर्व महसूस होता है । लक्ष्मी ने नॉट बुक में  कुछ लिखी और मेरे तरफ मोड़ दी लिखा था - " हमें डर था कहीँ असलियत का पता चलते ही आप चैट बंद कर देंगे । इसीलिए हमने आप को इसकी खबर नहीं होने दी । " एक पाठक मुझसे चैट कर इतना खुश था , जान कर बहुत हर्ष हुआ । मैंने कहा - एक लेखक बहुत ही संवेदनशील होता है । लेखक हमेशा जोड़ता है , तोड़ता नहीं । हमारी आँखे सुखने का नाम ही नहीं ले रही थी । सबसे ज्यादा पत्नी का जो लक्ष्मी का सिर गोद में रख कर एक माँ जैसा प्यार न्योछावर कर रही थी । दुर्लभ दृश्य ।

बेयरा भोजन की सामग्री रख कर चला गया था । दोपहर का भोजन हो चूका था । हमलोगो के बिच बहुत सी बाते हुई । मैंने विजय को कहा - आप एक महान पुरुष से कम नहीं जो ऐसे दिव्यांग से शादी कर ख़ुशी से जीवन बिता रहे है । आप वास्तव में एक पूण्य के भागीदार है । विजय मुस्कुरा कर स्वीकृती दी । मैंने उन्हें अपने बेटे की शादी में आने का अनुरोध किया । लक्ष्मी अपने पति की ओर देखने लगी जैसे कह रही हो - जबाब दीजिये । विजय ने कहा - अंकल जरूर आएंगे । इन्हें खूब पढ़ाओ बच्चों की तरफ इशारा कर कहा । लक्ष्मी नॉट बुक पर कुछ लिखने लगी और मेरे तरफ पढने के लिए बढ़ा दी । लिखा था - एक को लोको पायलट और दूसरे को प्लेन का पायलट बनाउंगी । पक्के और दृढ इरादे के आगे मैं नतमस्तक था । लक्ष्मी को देखते हुए मुस्कुरा दिया । बोला भगवान आप की मनोकामना पूरी करे । यही तो है दिव्यांग । लक्ष्मी  नॉट बुक में फिर कूछ लिखी - लिखा था मेरे बेटो के शादी में आप लोग जरूर आएंगे । हमने हामी भर दी । मजाक मजाक में मेरे मुह से निकल गया - आप की आने वाली बहुए आप को चैतानी कहेंगी । सभी खिलखिला कर हंस दिए । लक्ष्मी शर्म से मुस्कुराते हुए सिर निचे झुका ली ।

जीवन का एक अदभुद अनुभव था । शव्दों में गूँथना काफी नहीं है । उन्हें जाने देने का मन नहीं कर रहा था । मैं अपने प्रोग्राम को अधूरा छोड़ यहाँ उनके लिए रुक था । जिसका लक्ष्मी और उसके पति ने धन्यवाद जाहिर की । शाम को बिदाई के समय पत्नी ने गिफ्ट का पैकेट लक्ष्मी को दिए जिसे हमने पहले से ही तैयार रखा था । मैंने लक्ष्मी के दोनों बेटो के हाथ पर सौ सौ के नोट पकड़ा दिए । फिर एक बार लक्ष्मी ने हम दोनों के पैर छुए । हमने आशीर्वाद हेतु अपने हाथ उसके सिर पर रख दिए । जाते जाते हमने देखा लक्ष्मी की आँखे गीली हो गयी । वह अपने साड़ी के पल्लू को मुँह पर दबाएं  सपरिवार आगे बढती जा रही थी और घूम घूम कर हमें देख रही थी जैसे कह रही हो अंकल गलती माफ़ करना । हमने उसके आँखों में आंसुओ की धारा बहते देखा । हमारी आँखे भी नम हो गयी और हाथ स्वतः ऊपर उठ गए आशीर्वाद हेतु ।



(यह पोस्ट माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के " बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ " योजना को समर्पित है । यह एक समसामयिक लेख है । इसका यथार्थ से आंशिक सम्बन्ध  है । यह सत्य घटनाओ पर आधारित है नाम , जगह काल्पनिक है  । चित्र  - साभार व्हाट्सप्प )














Saturday, August 20, 2022

बांके बिहारी

 हर वर्ष जन्म दिवस पर हमारे मन मे परिवर्तन होते है क्या ? बिल्कुल । किन्तु सकारात्मकता होनी चाहिए । जो एक नही बहुतो को मान्य ही । यही है सत्य और दिल की सुकून ।

जय जय कृष्णा ।

Wednesday, March 17, 2021

मन की हार - हार है , मन की जीत - जीत


जब तक अर्थ है - कुछ भी व्यर्थ नही होगा  । जिंदगी की भाग दौड़ इसी अर्थ के इर्द गिर्द मंडराती रहती है । येे  सुबह बिस्तर से अलग होने और शाम को विस्तर से चिपकने तक - सभी कार्य इसी के अनुरूप होते है । संक्षेप में कहें तो जीवन अर्थ के बिना अर्थहीन ही है । जीवन को जीवंत बनाने के लिये जीवंत आत्मा आवश्यक है।

आत्मशक्ति ही हमे नियंत्रित करती है अन्यथा बिन लगाम घोड़ा की स्थिति हो जाएगी । कभी कभी आत्मा की आवाज न सुनना भी भारी पड़ जाता है । ऐसा ही तो हुआ था , जब मैंने दोस्त के बेटे की शादी जो 03-01-2021 को तिरुपति देवस्थानम सामूहिक गृह में होना निश्चित था , को मिस किया था । इसलिए कि परिवार के अन्य सदस्य शामिल हो जाएंगे । बाद में बहुत पछतावा भी हुई थी । 

उस दिन मैं 02692 एक्सप्रेस ( राजधानी स्पेसल ) को लेकर सिकंदराबाद से गुंतकल को आ रहा था । ट्रेन नार्मल ढंग से चल रही थी । कोई शिकायत या शिकवा नही था । ट्रेन नवांगी स्टेशन से गुजरने वाली थी , उसके दो ढाई किलोमीटर के पहले ही लोको के अंदर से एक जोरदार धमाके की आवाज सुनाई दी । हम किसी अनजान समस्या कोभाप  डर गए । उप लोको पायलट ने लोको का मुआयना किए , कहीं भी कुछ समस्या जैसी स्थिति नही थी। फिर भी मन न माना । 

किसी अनजान भय से आत्मा के अंदर कंपन होने लगी । ऐसा होने पर मुझे हमेशा ही कुछ समस्याओं से गुजरना पड़ा है । हो न हो कुछ तो कारण होंगे । अन्यथा विस्फोटक आवाज नही आती । मैंने यह सुनिश्चित किया कि अगले स्टेशन में ट्रेन को रोक , लोको की जांच करेंगे , और तत्पश्चात ही आगे बढ़ेंगे । 

नावनगी स्टेशन में ट्रेन को खड़ा किया । जब कि नॉनस्टॉप स्टेशन था । हम दोनों लोको निरीक्षण करने लगे । देखा कि होटल लोड के कनवर्टर से आग की लपटें निकल रही थी । हमारी अंदेशा सही साबित हुई । जैसे तैसे दो घंटे में आग को बुझाई गयी । ट्रेन के सभी रेलवे के कर्मचारियों ने आग बुझाने में अपने भरपूर सहयोग दिए । अगर ट्रेन नही रोका होता तो आग की बड़ी दुर्घटना से इनकार नहीं किया जा सकता ।

इस अनजान घटना ने ट्रेन के समय से चलने में बाधा तो बनी पर समय से ली गयी निर्णय ने अन्य जघन्य नुकशान से रेलवे को बचाए । इसके बाद जो हुआ ,वह मुझे बरबस सोचने के लिए मजबूर किया कि मैंने आत्मा की आवाज को क्यों दबाई ? 

हमे जीवन मे कई बार ऐसे मोड़ आते है जहां हम सही निर्णय से मुकर जाते है । दिल की बात जरूर सुननी चाहिए ।अगर दोस्त के बेटे की शादी में सपरिवार मैं भी शामिल हुआ होता तो ऐसी अनहोनी घटना में प्रत्यक्ष प्रमाण से बच सकता था और मेरी जगह कोई और होता था ।



Sunday, June 14, 2020

स्वामी भक्त


   कहते है मनुष्य दुनिया का सबसे उन्नत और विकसित प्राणी है ।   जिसके पास दुनिया की सबसे बड़ी सुख सुविधाओं की अम्बार लगी होती है । दुनिया मे एक से बढ़ कर एक शक्तिशाली और निरीह जंतु है पर बहुत कम जीव जंतु चालाक किस्म के होते है ।

संक्षेप में जीव जंतुओं को नभचर , जलचर और स्थलचर के समूह में बांटा गया है । मनुष्य प्राणी का लगाव सबसे ज्यादा स्थलचर से रहा है । इन जीव जंतुओं पर मनुष्य का एकाधिकार सदैव कायम है । इन जीव - जन्तुओ को        मनुष्य  तरह - तरह से इस्तेमाल करता आ रहा है । ये निष्क्रिय जीव जंतु मनुष्य के क्रूरता के शिकार बनते रहे है । ज्यादातर जीव तो मनुष्य के आहार बन जाते है । इन मूक जीवों की आह शायद हमें श्राप भी देती होगी जिसे हम मानव समझने में देर भी कर देते है । मानव इस दुनिया का सबसे सचेत और उत्कृष्ट प्राणी होकर भी अपनी क्रूरता को नही छोड़ता । जो चिंतनीय है ।

       मैंने देखा है लोग गाय , भैंस या बैल या बकरी या भेड़ को मुर्गी के अंडे की तरह उपयोग करते है और जब काम निकल जाते है तो उन्हें कसाई के हाथों बेच देते है । इन जीवों को कैसा लगता होगा जब कसाई की छुड़ी उनके गर्दन पर चलती होगी ? उनके अन्तःमन से निकली हुई  मूक बददुआ के भागीदार भी तो हम ही है ।

         काश दुनिया का अनमोल प्राणी मनुष्य इतना निर्दयी न होता । इस धरा पर सभी जीव - जंतुओं को जीने का अधिकार है , जिसे छिनने का अधिकार किसी को नही ? क्योंकि जब हमारे पास जीवन देने की शक्ति नही है तो जीवन लेने का अधिकार किसने दे दिया ? हमे चाहिए कि प्रत्येक जीव को अपने जीवन तक भरपूर जीने दें !💐

         स्वामी भक्ति भी अजीब होती है । जो स्वामिभक्त होता है वह अपने प्यार और कर्म को अपने स्वामी के प्रति न्योछावर कर देता है । उसके रहने पर प्यार और जाने के बाद दर्द की धारा निश्छल रूप से बहने लगती है । ऐसा ही तो था मेरा प्यारा - लकी ।



          कहने को कुत्ता ( Labrador ) था पर एक परिवार या बेटे से कम नही था ।  उसका जन्म 04.04.2015 को अन्तपुर में हुआ था । वह एक माह की उम्र में हमारे घर मे प्रवेश किया था । बहुत ही प्यार और दुलार से हमने उसका पालन - पोषण किया था । लकी आज 18-05-2020 सुबह साढ़े आठ बजे मेरे बांहों में अपने जीवन का अंतिम सांस लिया था । मेरे नेत्र अपने आंसुओ को नही रोक पाए थे , मैं उसे बांहों में पकड़े हुए फफक फफक कर रो दिया था । एक प्यारा दोस्त और जिगर का टुकड़ा मुझे छोड़ चल दिया था । उसकी यादें - आंसू के साथ गीले हो जाती है । परिवार के सभी लोग एक अकेला पन महसूस करने लगे है । ये यादें - लकी की सुनहरी आंखे जो सदैव प्यार ही प्यार बरसाई करती थी - भविष्य में लंबे समय तक भूल पाना बहुत ही मुश्किल है ।

💐💐💐💐

आज के दैनिक पञ्चाङ्ग एवं चौघड़िया मुहूर्त
सोमवार, १८ मई २०२०
सूर्योदय : ०५:२३
सूर्यास्त : १८:४९
चन्द्रोदय : २७:२४
चन्द्रास्त : १५:०६
शक सम्वत : १९४२ शर्वरी
विक्रम सम्वत : २०७७ प्रमाथी
माह : ज्येष्ठ
पक्ष : कृष्ण पक्ष
तिथि : एकादशी - १५:०८ तक
नक्षत्र : उत्तर भाद्रपद - १६:५८ तक
योग : प्रीति - २८:३० तक
प्रथम करण : बालव - १५:०८ तक
द्वितीय करण : कौलव - २८:२० तक
सूर्य राशि : वृषभ
चन्द्र राशि : मीन
राहुकाल : ०७:०४ - ०८:४५
गुलिक काल : १३:४७ - १५:२७
अभिजितमुहूर्त : ११:३९ - १२:३३
दुर्मुहूर्त : १२:३३ - १३:२७
दुर्मुहूर्त : १५:१४ - १६:०८
अमृत काल : ११:३४ - १३:२२
चौघड़िया मुहूर्त
अमृत~०५:२३ - ०७:०४
शुभ~०८:४५ - १०:२५
चर~१३:४७ - १५:२७
लाभ वार वेला~१५:२७ - १७:०८
अमृत~१७:०८ - १८:४९
💐
आज का विचार 
श्रेष्ठ होना कोई कार्य नही बल्कि यह हमारी एक आदत है जिसे हम बार बार करते है।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
💐
      *अच्छे लोगों की इज्जत*
        *कभी कम नहीं होती*

     *सोने के सौ टुकड़े करो,*
            *फिर भी कीमत*
            *कम नहीं होती*।
💐
        *भूल होना "प्रकृत्ति" है,*
       *मान लेना "संस्कृति" है,*
*और उसे सुधार लेना "प्रगति" है.*
     🌹 *शुभ दिन*🌹
   💐 *जय श्री कृष्णा* 💐

लकी की कुछ निश्चल यादें - 

             मूक प्राणियों की कथा भी अजीब होती है । ये मुंह से कुछ नही बोल सकते परंतु इनकी तरह - तरह की भंगिमाएँ ,उनकी समझ को प्रकट कर देती है ।।

                 ये मेरा लकी पूरे परिवार का प्यारा था । बचपन से जैसे जैसे उम्र की ऊंचाइयों पर चढता गया था उसकी कारनामे अजीबोगरीब होती गयी थी। बहुत ही साफ सफाई का आदी । उसने कभी भी - रात हो या दिन , घर के अंदर पेशाब या टट्टी नही किया था । ऐसी आवश्यकता के समय वह मेरे पास आकर उकड़ू बैठ जाता था और एक टक लगाकर देखने लगता था । मुझे उसकी समस्या के अनुभव करते देर नही लगती थी और सिर्फ और सिर्फ मैं ही उसे बाहर ले जाता था । ऐसा नही करने पर उसकी भौक शुरू हो जाती थी ।



             घर का  हर सदस्य उसका दोस्त और वह सबका दोस्त था उसे दो तीन दिनों में स्नान करवाने पड़ते थे । स्नान करवाने की जिम्मेदारी भी मेरी ही थी। टॉवेल , शैम्पू देखते ही नल के पास खड़ा हो जाता था । बहुत ही इत्मीनान से स्नान करने का आदी था । हम सभी उसे अपने सामने पाकर अतीत के क्षणों को आसानी से भूल जाते थे । पलंग पर नजदीक बैठना, किसी के साथ सोना - ऐसे क्षण उंसके लिए अपार खुशी के होते थे । पलंग पर भले ही वह चढ़ जाये पर सोये हुए व्यक्ति को डिस्टर्व नही करता था । 

                       कुछ तस्वीरें मेरे बड़े पुत्र के साथ -




              अजीब सोंच और समझ थी उसकी । शायद इंसान में भी नही होती । मैं जब कभी रात को ड्यूटी से आने के बाद सो जाता था - तब सुबह सुबह लकी ही मुझे मॉर्निंग वॉक के लिए उठने के लिए विवश करता था । हम स्वतः सुबह 5 बजे उठ नही सकते अलार्म की सहारे लेने पड़ेंगे , पर वह बिल्कुल 5 बजे आकर पैर के पास बैठ जाता था और मुझे उठाने हेतु धीरे धीरे अपने पैरों से मेरे पैरों को कुरेदना शुरू कर देता था। मैं उठ गया तो ठीक अन्यथा वह भी बगल में सो जाता था । किन्तु कभी भी भोंक कर किसी को डिस्टर्व नही करता था । शायद वह जानता था कि भोंकने से सभी को असुविधा हो सकती है । 

                      कुछ उंसके बचपन के तस्वीर -

 








             मेरे पोते कुँवर सुशांत जी का जन्म दिवस के अवसर पर लकी जी को देखिए - कैसे परिवार के बीच बैठे है । केक काटने का सब्र उन्हें भी है 🎂


           कुत्ते बहुत ही स्वामी भक्त और सच्चे सेवक होते है । घर की रक्षा या स्वामी की सुरक्षा सच्चे मन से करते है ।आज तक हमारे घर की तरफ किसी ने भी आंख उठा कर देखने की हिम्मत नही की । मजाल है जो बिन अनुमति हमारे घर मे कोई प्रवेश कर जाए । आज लकी का प्रेम और यादें कुछ लिखने के लिए मजबूर कर दिया जिसे मैं रोक नही पाया । लेख लंबा नही करना चाहूंगा अतः अंत मे भगवान से यही कर जोड़ प्राथना करूँगा की लकी की आत्मा जहाँ भी हो उसे शांति ॐ प्रदान करें ।

            आज कभी कभी ऐसा लगता है कि उसके मृत्यु का कारण भी हम ही है । ख़ाने में कोई कमी नही थी । उसकी मोटापा उसे बीमार बना दी थी । वह कई दिनों से आहार लेना बंद कर दिया । इलाज भी कराया गया था किंतु उसे कैंसर हो गया था । इसे समझने में हमने बहुत देर कर दी थी । इसका दुख सदैव रहेगा । उसे हमने घर के सामने बगल में ही समाधि दी । उंसके याद में समाधि के ऊपर एक वृक्ष लगा दिए है ।




💐💐 लकी को एक श्रद्धांजलि 💐💐 



Monday, January 20, 2020

सब कुछ ठीक हैं क्या ?

मतदान के पूर्व किसी सरकार के फ्री आफर , दोनों हाथों से धन का अपार व्यय या लोकलुभावन कार्य के निम्न कारण होते है -
1. पब्लिक को अपने तरफ आकर्षित करना 

2.अपने दूसरे कार्यकाल को सुनिश्चित करना 

3.हार जाने के पूर्व खजाने खाली करके जाना ।

4.अगर जीत गए तो चार वर्ष लूट , तीसरे कार्यकाल को बोनस अंक समझना ।जीते तो भी ठीक , हारे तो भी ठीक ।

5. अगर हार गए तो आने वाली सरकार के लिए समस्या जिंदा रखकर जाना ।

6.हारने के बाद अपने लिए मुद्दा जिंदा रख कर जाना क्योंकि आने वाली सरकार फ्री को ज्यादा दिनों तक नही चला पाएगी ऐसी हालत में इन्हें जिंदा मुर्दा मिल जायेगा - देखो मैने फ्री दिया था इन्होंने बंद कर दिया ।

7.आने वाली सरकार उस खर्च को पूर्ति में व्यस्त रहेगी और कुछ नई करना मुश्किल होगा । और इन्हें उस सरकार को घेरने के लिए आसानी से मुद्दा मिल जाएगा ।

8.पिसेंगे पब्लिक क्योंकि इन्हें मालूम है पब्लिक अंधी है और नेक्स्ट टर्म फिर इनका ही होगा ।

9.उपरोक्त सठीक है या गलत - अपने अपने राजनीति पर निर्भर करता है । पिसती तो पब्लिक ही है , फिर भी कहते है पब्लिक सब जानती है ।

10.खाक जानती है - एक नेता का धैर्य ने कहा ।

समझदारी का परिचय दीजिये । जागरूक नागरिक , ससक्त देश । तभी विश्व सलाम करता है ।।

Friday, August 10, 2018

पत्रकार की अस्मिता ( लघु कथा )


सरकार बदल चुकी थी । नई सरकार का होना और उनके कार्यक्रम से बिदित था कि यह सरकार कड़क चाय की प्याली है । पत्रकारों के चैनलों की टीआरपी घटने लगी थी । लोगो का विश्वास सरकार के प्रति बढ़ चला था ।चोर उचक्के अपने सुरक्षा के प्रति जगह ढूंढने लगे थे । विरोधियों के बेचैनी थी क्युकी जनता ने उनके कर्मो की सजा दे चुकी थी ।टीवी वालो की चिंता टीआरपी पर थी । आज आवश्यक मीटिंग में यह कार्यक्रम पेस हुए की टीआरपी बचाने के लिए कोई स्टिंग की जाय जो सरकार की कमजोरी उजागर करे । मंथन जारी था ।

सवाल यह था कि सरकार के विरोध में कोई भी कर्मचारी स्टिंग के लिए तैयार कैसे होगा ? एक पत्रकार ने धीरे से कहा - चिंता न करें । काम हो जाएगा । आप स्टिंग की तैयारी करें ।

सदानंद टीवी के सामने बैठकर समाचार देख रहा था । आज स्टिंग की समाचार आने वाली थी । पत्नी  नाश्ते की प्लेट के साथ हाल में हाजिर हुई । स्टिंग ऑपरेशन प्रसारित होने लगा । सदानंद और पत्नी की आंखे टीवी स्क्रीन पर टिकी हुई थी । अरे ये क्या ? आप की तस्वीर दिख रही है - पत्नी कुछ सहमी सी आश्चर्य के साथ बोली । हां भगवान मै ही हूं । 

तो क्या आपने अपने विभाग के खुफिया जानकारी को लिक करने लगे  है ? पत्नी का सवाल सुन सदानंद कुछ मंद मंद मुस्कुराया और बोला - क्या हो गया । विभाग मे बहुत ही भ्रष्टाचार व्याप्त है  , किसी को तो सामने आना चाहिए ? 

तभी अगली समाचार दोनों की आंखो के तैर गई । विभाग का एक अफसर संवाद दाता से मुखातिब होकर कह रहा था - सरकार सभी शिकायतों की जांच करवाएंगे । हमने सदानंद को तुरंत निलंबित कर दिया है ।

पत्नी को जैसे लकवा मार दिया । अब क्या होगा । विभागीय कार्यवाही होगी । सदानंद की नौकरी खतरे में । झिल्लते हुए बोली - अब क्या होगा ? हमेशा उल्टा पुल्टा कार्य करते रहते है ।

सदानंद मंद मंद मुस्कुराते हुए उठा और अपना ब्रीफकेस लाकर पत्नी के समक्ष रख दिया । बोला _ खोलो ? पत्नी की आंखे फटी रह गए । ब्रीफकेस नोटों से भरा हुआ था । 

पूरे एक करोड़ है । नौकरी का डर नहीं ।जीवनभर नौकरी करने के बाद भी सरकार का सेटलमेंट इतना नहीं आएगा । सदानंद ने पत्नी से कहा । पत्नी धीरे से बोली - तो यह है स्टिंग की उपहार । तुम बड़े वो हो जी । मुझे आज हार और कंगन खरीद दीजिए ।

( इससे सत्य का कोई तलुकात नहीं अगर होता है तो प्राकृतिक । सोने का देश किन्तु चिंतनीय ।)

Thursday, December 21, 2017

इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन ट्रेनिंग सेंटर / विजयवाड़ा

जैसा कि मैं रेलवे में लोको पायलट हूँ । पिछले कई वर्षों से राजधानी एक्सप्रेस में कार्यरत हूँ । उच्च पद पर पहुंचना अपने आप मे एक भाग्योदय का प्रतीक माना जाता है । किन्तु इसके साथ ही तरह तरह की नई जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती है अगर आप ईमानदार और अनुशासित है , तो किसी तरह के डर की गुंजाइश नही । भ्रष्ट लोगो को हमेशा डर घेरे रहता है । भ्रष्टाचार एक नासूर है जो जीवन मे तरह तरह की परेशानियों के मूल कारण  है । किसी भी तरह के डर दिल मे अशांति पैदा करती है। अतः जीवन मे अशांति का कोई स्थान नही होनी चाहिए ।

 जीवन मे खुशी का माहौल हमे स्वास्थ्य प्रदान करते है । इसीलिए कहा गया है कि खुश रहें और दूसरो को भी खुश रखें ।


लोको पायलट का जीवन बिन अनुशासन व्यर्थ ही है । हमारे कार्य ही ऐसे होते है कि बिना अनुशासन के सुरक्षा और संरक्षा संभव ही नही है ।  यदि आप के साथ कोई दुर्घटना हो जाती है , तो इंक्वायरी नियम और कानून के दायरे में ही घुमाती रहती है । उस समय कोई भी लोको पायलट की मदद नही कर सकता। लोको पायलट को स्वतः अपनी बचाव करने पड़ते है । इसके लिए एक ही चीज काम आएगी और वह है - अनुशासन पूर्वक किया गया कार्य । दोस्तो , लोको पायलट का जीवन जितना कष्टकर है उतना ही आनंदायक भी । 

आप एक बार ड्यूटी से मुक्त हुए और दूसरी ड्यूटी तक फ्री रहेंगे । आप को कोई भी कुछ कहने वाला नही मिलेगा  । वैसे देखा जाय तो कोई भी कार्य बिना रिस्क का नही होता है । योग्य और अनुभवी  रिस्क को भी अंगुली पर नचाते है ।

मेरे पास बहुत सारे फोन या व्हाट्सएप्प के माध्यम से संदेश आते रहते है , जो प्रायः नौजवानों के होते है । दसवीं पास या कुछ और पढ़ाई करने वालो के ज्यादा  । उन सभी के एक ही प्रश्न होते है कि लोको पायलट बनने के लिए शैक्षणिक योग्यता क्या है ? मुझे भी लोको पायलट बनना है , इसके लिए क्या करूँ ? अतः मैने व्हाट्सएप्प पर एक ग्रुप बना रखी है । इसमे उन सभी युवको को जोड़के रखता हूँ , जिन्हें लोको पायलट बनने के लिए  विस्तृत जानकारी चाहिए । अतः कोई भी युवक मुझसे फोन या व्हाट्सअप के माध्यम से संपर्क कर सकते  है ।

अब आइये एक दर्दभरी दास्तान सुनाता हूँ 

 मैं राजधानी एक्सप्रेस में कार्य करता था । उस समय राजधानी डीजल लोको से चलती थी । पहली जुलाई 2017 से  इलेक्ट्रिक लोको उपयोग में है लाया गया है चुकी मुझे इलेक्ट्रिक लोको की ट्रेनिंग नही थी , इसीलिए विजयवाड़ा ट्रेनिंग सेंटर में , जाने पड़े । मैं 7 जुलाई 2017 को ट्रेनिंग सेंटर में रिपोर्ट किया था । ट्रेनिंग का कार्यकाल 66दिनों का था । मेरे क्लास में लोको पायलट थे जो अलग अलग डिपो से ट्रेनिंग के लिए आये थे । ट्रेनिंग में आने के पूर्व ही एक हौआ फैला हुआ था कि इलेक्ट्रिक ट्रेनिंग बहुत हार्ड होती है । यह सबके बस का नही है । खैर जो भी हो हमारी ट्रेनिंग शुरू हो चुकी थी । दिनोदिन की शिक्षा उस हौवे को सही साबित कर रही थी । 10 दिनों तक तो बहुत असुविधा महसूस  हुआ किन्तु  धीरे धीरे कुछ आरामदायक और नॉर्मल होने लगा  । वैसे  नया विषय हमेशा कठिन ही लगता है । 

हमारे ट्रेनिंग के प्रोग्राम - 

कन्वेंशनल लोको की जानकारी , सिम्युलेटर ट्रेनिंग और थ्री फेज लोको की जानकारी थी । इसके अंतराल में ऑन लाइन प्रैक्टिकल ट्रेनिंग भी थी । सभी सुचारू रूप से चल रहे  थे । रोज चार पीरियड , कम से कम डेढ़ घंटे  कि होती थी को अटेंड करने होते थे  । हमारे इंस्ट्रक्टर श्री के कल्यानराम जी थे । जो पूर्व के लोको पायलट ही थे । मेहनती तो थे ही , क्लास में आते ही , पहली पीरियड वार्तालाप पर आधारित था , जिसमे वे पिछले दिनों पढ़ाई हुई विषय पर प्रश्न करते थे । बारी बारी से सभी को उत्तर देना पड़ता था । उम्र दराज वाले  उत्तर न दे पाने पर शर्म महसूस भी करते थे । बहाने भी बना देते थे कि   हमारी उम्र पढ़ने की नही है । हमारी याददाश्त भी कमजोर है । रोज की यह   प्रक्रिया ,  बहुतो के मन मे टेंशन उत्तपन्न कर दिया । बहुत से लोको पायलट हमेशा टेंशन में रहने लगे थे ।

मुझसे जो भी मिलता , उसे मै  समझाने की प्रयास करता था । धीरे धीरे सब आसान हो जायेगा । एक दिन की बात है रवि रंजन और धनंजय कुमार सिम्युलेटर ट्रेनिंग में गए । उनकी क्लास सुबह 6 बजे लगी । प्रायः दो घंटे की थी । प्रैक्टिकल ट्रेनिंग हेतु बाकी लोग विजयवाड़ा ट्रिप शेड में चले गए । हम लोग ट्रेनिंग के लिए एक लोको के अंदर थे । लोको के औजारों के मुआयने कर रहे थे । कुछ समय बाद लोको से बाहर आ गए । पानी पीने के लिए आफिस के तरफ बढ़े । तभी एक सहपाठी मेरे नजदीक आया और पूछ - " सर कुछ मालूम है ?"   मैने  पूछा - क्या ? तब तक दूसरे सहपाठी ने कहा कि - रवि रंजन को हार्ट अटैक आया है । अभी रेलवे अस्पताल में है । मैने अपने मोबाइल पर नजर दौड़ाई ? देखा हमारे इंस्ट्रक्टर कल्यानराम का मिस कॉल था । बजह साफ जाहिर हो चुका था । मैंने तुरंत उन्हें कॉल किया । कल्यानराम जी कॉल रिसीव किये और तुरंत अस्पताल आने को कहा । 

हम सभी लोग रेलवे अस्पताल की तरफ चल पड़े । आज दिनांक 17-08-2017 था । हमने देखा - प्रिंसिपल से लेकर सारे इंस्ट्रक्टर अस्पताल में मौजूद थे । पता चला कि रवि रंजन अब इस दुनिया मे नही रहे । 35 वर्ष के आस पास की आयु और इस तरह का हार्ट अटैक सभी को सोचने के लिए बाध्य कर रहा था । एक माह पूर्व ही वह एक बेटे का पिता बने थे । इस घटना की जानकारी रविरंजन के गॉव को बता दिया गया । रविरंजन बिहार के रहने वाले थे । रेलवे की नौकरी भी कोई ज्यादा दिन की नही थी । यही कोई 8 वर्ष के आस पास । 

यह समाचार सभी डिपो में आग की तरह फैल गयी । व्हाट्सएप्प का जमाना जो है । विजयवाड़ा /रायचूर में उनका कोई नही था । अतः मेडिकल डिपार्टमेंट के अनुरोध पर उनके तीन रिश्तेदार गांव से एक दिन बाद आये । कागजी कार्यवाही / पोस्टमॉर्टम के बाद उनके पार्थिव शरीर को तीन सह कर्मियों  की देख रेख में , विमान द्वारा पटना भेज दिया गया । उनके परिवार और पत्नी पर क्या गुजरा होगा ? हम आसानी से समझ सकते है । लेकिन जिसे मौत आ जाये , कोई नही बचा सकता ।

इस घटना के बाद ट्रेनिंग स्कूल विवादों में घिर गया । कई ट्रेड यूनियनों ने इन्क्वायरी की मांग की । तो किसी ने हमारे इंस्ट्रक्टर के ऊपर दोषारोपण भी कर दिए , शायद कुछ लोगों की नजर में उनका  स्ट्रीकर व्यवहार ही इस मौत का कारण बना हो । कहने वाले हजार कहेंगे । किन्तु ये भी सत्य है कि ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट में कोई किसी को क्यों मारेगा । कुछ दिनों तक विवाद बढ़ने की आशंका थी पर धीरे धीरे सब शांत हो गया ।


  • इस तरह के कटु सत्य और अनुभव जीवन मे आते ही रहते है । संक्षेप में कहे तो मौत के कारण नही होते , जबकि मौत एक जीवन की सम्पूर्ण यात्रा है जो स्वयं आती है , इस पर किसी का दबाव नही होता । जीवन में धैर्य और शांति से ही सुखमय जीवन का लाभ मिल सकता है । हम ही हमारे जीवन के रखवाले है । आएं बिना दोष के जीवन जीने की आदत डालें ।

Wednesday, May 31, 2017

माँ वैष्णो देवी यात्रा - 6

आज 10 मई 2016 , दिवस मंगलवार है । दिल्ली से कोपरगाँव के लिए झेलम एक्सप्रेस में सीट रिजर्व था । सुबह जल्दी तैयार हो गए । बोर्डिंग नयी दिल्ली स्टेशन से थी ।  होटल से रेलवे स्टेशन काफी नजदीक ही है , फिर भी ऑटो वाले एक सौ रुपये की मांग रख रहे थे । अजीब है कमाई ! दुनिया में ईमानदारी भी कोई चीज है या नहीं । एक दूसरे ऑटो वाले ने 50 रुपये में रेलवे स्टेशन तक पहुंचा दिया । सुबह नाश्ते की आदत है । रेलवे स्टेशन के सामने ही एक तमिल वाले  की दुकान दिखाई दी । ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि यहाँ अच्छे नास्ते की संभावना थी ।

हम दुकान में प्रवेश किये । हम सभी , जिसे जो खाने की इच्छा थी   , उसकी फरमाइश पेश कर दिए  । इडली , डोसा , पोंगल यानि हर दक्षिण भारतीय नास्ते उपलब्ध थे । पर एक विशेषता यह दिखी की सभी आइटम  टेस्टी भी थे  । बिलकुल दक्षिण भारतीय होटलो की तरह । साफ सुथरा नार्मल था और बिल भी वाजिब । आज बहुत दिनों के बाद कुछ स्वादिष्ट खाने के लिए मिला था ।

मैं आज बहुत आनंद महसूस किया । हमारी ट्रेन समय से आधे घंटे लेट थी । हमने दोपहर का आहार भी इसी दुकान से लेनी चाही किन्तु इसके लिए और 2 घंटे wait करने पड़ेंगे । हमारे पास समय नही था । अतः ट्रैन में ही ले लेंगे , की आस पर प्लेटफॉर्म में आ गए । जैसा कि सर्व विदित है कि कुछ ट्रेनों में पेंट्री कार होते है जो यात्रियों को खाने पीने की सामग्री की व्यवस्था करते है । इस सुविधा के पीछे रेलवे की धारणा यही है कि इससे यात्रियों को उचित दर पर खाने - पीने के बस्तुओं की व्यवस्था हो पाएगी । आज कल रेलवे इसे ठेकेदारों के माध्यम से प्रायोजित करता है । किसी भी क्षेत्र में ठेकेदारों के क्या योगदान है सभी जानते है । एक तरह से ये प्रथा एक कानूनी लूट को ही इंगित करती है । जहां भी ठेकेदारी है वहाँ गुडवत्ता का अभाव और लूट ज्यादा है । जनता परेशान और प्रशासन मस्त रहते है ।

मेरे विचार से ठेकेदारी सरकारी तंत्र में मलाई खाने का एक आसान साधन है । सरकारी तंत्राधीश नजराने लेते है और ठेकेदार को एक के माल को नौ के भाव पास कर देते है । ठेकेदारों और सरकारी तंत्रकारो के मकड़ जाल ऐसे होते है कि कोई उनके विरोध में आवाज नही उठता है । इसके स्वप्निल रूप चित्रपट में प्रायः  दिखते है । आईये झेलम एक्सप्रेस के ठेके ( पैंट्रीकार ) के ऊपर एक दृष्टि डालें -

पैंट्रीकार वाले अग्रिम आर्डर ले लेते है । उस दिन भी वैसा ही हुआ । एक युवक दोपहर के भोजन का ऑर्डर लेने के लिए हमारे सीट के पास आया । हम ऐसी two टायर में थे । उसने वेज खाने की कीमत 120 रुपये बतायी । मुझे गुस्सा आ गया । वेज खाना इतना महंगा और मात्रा भी काफी कम होते है । मैंने उससे मेनू लाने के लिए कहा । कुछ समय बाद वह एक पेपर लेकर आया जिसमे तरह तरह के व्यंजन और उनके कीमत अंकित थे । वेज का कीमत 120 रुपये ही था । 120 रुपये में कौन सी सामग्री सर्व होगी , सब कुछ था । हमारी मजबूरी थी । 3 खाने का आर्डर दे दिया गया । करीब डेढ़ बजे दोपहर को खाने के पैकेट हमे दिया गया । सबसे पहले पुत्र जी ने एक पैकेट खोले और भोजन की शुरुवात की । आहार में कोई टेस्ट नही था । चावल के दाने काफी मोटे मोटे तथा लिस्ट के मुताबिक व्यंजन नही दिए गए थे । ऊपर की तस्वीर देंखें ।

कीमत के अनुसार अव्यवस्था देख मुझे बहुत गुस्सा आया । मैंने रेलवे मंत्री को ट्वीट करनी चाही किन्तु नेट की असुविधा से ऐसा न कर पाया । जब पैंट्रीकार के प्रबंधक को मालूम हुआ तो वह और टीटी भी आये । प्रबंधक ने क्षमा मांगी और बहाने में कहने लगा कि गलती से ये आप के पास आ गया । मैं उनके बहाने बाजी समझता था । भोजन वापस कर दिया । मैने उन्हें बता दिया कि इसकी ऊपर शिकायत करूँगा । प्रबंधक सहम गया । उसने पैंट्रीकार से टी और ब्रेड भिजवाई । ताकि मैं शिकायत न करूँ । मैंने अस्वीकार कर दिया और बड़े पुत्र को फोन लगाया । दूसरे तरफ से पुत्र ने फोन उठायी । मैन उन्हें पूरे किस्से बताए और घर से रेलवे को शिकायत भेज देने के लिए कहा । पुत्र ने ऐसा ही किया । शिकायत दर्ज हो गयी और शिकायत नंबर मेरे मोबाइल पर आ गया ।

PNR 2858871469
TN 11078
Date of journey 10.05.2016
NDLS to KP G
Meals quality and stranded very bad. Veg.
And even though they are about to charge Rs 120/-
I did not had and returned it due to.
advised TTE also on duty .
That type of meals even we are not feeding to our dog in home.

एक सप्ताह बाद मुझे रेलवे के कार्यालय ( दिल्ली ) से फोन आया । फोनकर्ता ने शिकायत की पूरी जानकारी पूछी । मैंने पूरी कहानी सुना दी और कहा कि ऐसा भोजन मेरा कुत्ता भी नही करता है । विश्वास न हो तो मेरे घर आकर जांच पड़ताल कर लें । किन्तु दूसरे तरफ से कोई उत्तर नही मिला । फोनकर्ता ने कार्यवाही करेंगे , कह कर फोन काट दी । कुछ दिन के बाद मुझे एक एस एम एस मिला । जो रेलवे का था । उसमें लिखा था कि झेलम एक्सप्रेस के ठेकेदार पर दस हजार का जुर्माना लगाया गया है । इस समाचार के बाद कुछ सकून मिला ।

इसके पहले एक समाचार पत्र में भी पढ़ा था कि रेलवे के महाप्रबंधक ने झेलम एक्सप्रेस के पैंट्रीकार की औचक निरीक्षण किया तथा अनेक अनिमियता देखी । ठेकेदार पर पचास हजार का जुर्माना ठोका ।

जी हां । रेलवे आप को सतत  उचित सेवा देने के लिए प्रयासरत है । क्या आप रेलवे की मदद करेंगे ?

अभी भी  न्याय जिंदा है ।

Sunday, March 19, 2017

लघु कथा - नोटबंदी पार्ट -2

मैं आज टी वी के सामने बैठा हुआ था । ऑफिस में बहुत देर हो गयी थी । सामने अखबार पड़ा हुआ था । ऑफिस में काम से कहा फुर्सत मिलती है । एक नजर दौड़ाई । देश और दुनिया में शांति से ज्यादा अशांति ही दिखाई दी । मैडम चाय लेकर आई । सामने रख दी । चाय की चुस्की लेते हुए टीवी की ओर देखा । साढ़े आठ बज रहे थे ।

देखा मोदी जी का कोई संबोधन प्रसारित हो रहा था ।
मोदी जी कह रहे थे -

" भाईयो और बहनों ,
आप ने देखा कि देश के भ्रष्टाचार को कम करने के लिए मैंने नोटबंदी का सहारा लिया । जिससे छुपे हुए कालाधन बाहर आ सके । यह आंशिक रूप से सफल और कारगर साबित हुआ है । फिर भी बहुत से कालाबाजारी कुछ बैंक की मदद से अपने छुपे धन को सफ़ेद करने में  कामयाब रहे । मैं उन्हें छोड़ने वाला नहीं । सभी पर कार्यवाही होगी और जरूर होगी ।
आज बारह बजे रात से कोई भी नोट कार्य नहीं करेगा । जिनके - जिनके पास नए 2 हजार और 5 सौ के नोट है , वे कल बैंक में जाकर अपने खाते में जमा करवा दें । पुराने नोट को अपने खाते में कोई भी सिर्फ एक बार जमा कर सकेगा । पुराने नोट एक ही खाते में दुबारा स्वीकार नहीं किये जायेंगे । 

यह  सुविधा 5 दिनों तक लागू रहेगा ।

50 हजार से ज्यादा जमा का लेख जोखा देना होगा अन्यथा स्वीकार नहीं किये जायेंगे । अब एटीएम से प्लास्टिक के नए नोट मिलेंगे ।

भाईयो और बहनों - 

मुझे आशा है आप लोग मेरे इस कार्यवाही को नोटबंदी एक की तरह  सहर्ष स्वीकार करेंगे । बाकी जानकारी बैंक वाले बता देंगे । आप सभी का धन्यवाद 
बन्दे मातरम भारत माता की जय ।" 

मेरे शरीर में सिहरन समा गयी । ये क्या नोटबंदी 2 आ गया ? ओह माय गॉड । मैं तो मर गया । 15 लाख कैश घर में रखे पड़े है । अब क्या होगा । लक्ष्मी लक्ष्मी लक्ष्मी दौड़ो ? 


पत्नी ने जोर से झटके दी । अरे सोये सोये ये क्या चिल्ला रहे थे । मैंने अपनी आँख को रगड़ते हुए कहा - " लक्ष्मी आज मैंने बहुत बुरी स्वप्न देखी है । देखा - मोदी जी ने नोटबंदी 2 लागू कर दी है । भगवान न करे ये कही सही हो जाय । लक्ष्मी जल्दी से तैयार हो जाओ । बैंक चलने है । मैंने पत्नी से अनुरोध किया । 

क्यों ? पत्नी ने एक झटके में पूछा । 

भाग्यवान , तुम मेरी लक्ष्मी हो । अलमारी में 15 लाख रखे है । कृपया अपने खाते में जमा करा दो । मैंने प्यार से गुहार किया । 

आखिर 15 लाख आये कहाँ से ? बोलो ना ? पत्नी जानने हेतु जिद्द करती रही । न चाहते हुए भी बताना पड़ा । कहा - " मोदी जी ने कर्मचारियों के वार्षिक इंक्रीमेंट के लिए - वैरी गुड - सर्विस रिकॉर्ड में होना अनिवार्य कर दिया है । अतः मैंने अपने अंतर्गत कर्मचारियों से 1 से लेकर 3 हजार तक बसूले है वैरी गुड रिमार्क के लिये । " 

पत्नी के मुख से निकले - पापी कही के । इतना कह पत्नी बाहर की ओर जाने लगी । मैं जाती हुई लक्ष्मी को आश्चर्य से देखता रह गया ।

( नोट - यह एक काल्पनिक लघु कथा है । सत्य से कोई सरोकार नहीं । )