Saturday, August 20, 2022

बांके बिहारी

 हर वर्ष जन्म दिवस पर हमारे मन मे परिवर्तन होते है क्या ? बिल्कुल । किन्तु सकारात्मकता होनी चाहिए । जो एक नही बहुतो को मान्य ही । यही है सत्य और दिल की सुकून ।

जय जय कृष्णा ।

Wednesday, March 17, 2021

मन की हार - हार है , मन की जीत - जीत


जब तक अर्थ है - कुछ भी व्यर्थ नही होगा  । जिंदगी की भाग दौड़ इसी अर्थ के इर्द गिर्द मंडराती रहती है । येे  सुबह बिस्तर से अलग होने और शाम को विस्तर से चिपकने तक - सभी कार्य इसी के अनुरूप होते है । संक्षेप में कहें तो जीवन अर्थ के बिना अर्थहीन ही है । जीवन को जीवंत बनाने के लिये जीवंत आत्मा आवश्यक है।

आत्मशक्ति ही हमे नियंत्रित करती है अन्यथा बिन लगाम घोड़ा की स्थिति हो जाएगी । कभी कभी आत्मा की आवाज न सुनना भी भारी पड़ जाता है । ऐसा ही तो हुआ था , जब मैंने दोस्त के बेटे की शादी जो 03-01-2021 को तिरुपति देवस्थानम सामूहिक गृह में होना निश्चित था , को मिस किया था । इसलिए कि परिवार के अन्य सदस्य शामिल हो जाएंगे । बाद में बहुत पछतावा भी हुई थी । 

उस दिन मैं 02692 एक्सप्रेस ( राजधानी स्पेसल ) को लेकर सिकंदराबाद से गुंतकल को आ रहा था । ट्रेन नार्मल ढंग से चल रही थी । कोई शिकायत या शिकवा नही था । ट्रेन नवांगी स्टेशन से गुजरने वाली थी , उसके दो ढाई किलोमीटर के पहले ही लोको के अंदर से एक जोरदार धमाके की आवाज सुनाई दी । हम किसी अनजान समस्या कोभाप  डर गए । उप लोको पायलट ने लोको का मुआयना किए , कहीं भी कुछ समस्या जैसी स्थिति नही थी। फिर भी मन न माना । 

किसी अनजान भय से आत्मा के अंदर कंपन होने लगी । ऐसा होने पर मुझे हमेशा ही कुछ समस्याओं से गुजरना पड़ा है । हो न हो कुछ तो कारण होंगे । अन्यथा विस्फोटक आवाज नही आती । मैंने यह सुनिश्चित किया कि अगले स्टेशन में ट्रेन को रोक , लोको की जांच करेंगे , और तत्पश्चात ही आगे बढ़ेंगे । 

नावनगी स्टेशन में ट्रेन को खड़ा किया । जब कि नॉनस्टॉप स्टेशन था । हम दोनों लोको निरीक्षण करने लगे । देखा कि होटल लोड के कनवर्टर से आग की लपटें निकल रही थी । हमारी अंदेशा सही साबित हुई । जैसे तैसे दो घंटे में आग को बुझाई गयी । ट्रेन के सभी रेलवे के कर्मचारियों ने आग बुझाने में अपने भरपूर सहयोग दिए । अगर ट्रेन नही रोका होता तो आग की बड़ी दुर्घटना से इनकार नहीं किया जा सकता ।

इस अनजान घटना ने ट्रेन के समय से चलने में बाधा तो बनी पर समय से ली गयी निर्णय ने अन्य जघन्य नुकशान से रेलवे को बचाए । इसके बाद जो हुआ ,वह मुझे बरबस सोचने के लिए मजबूर किया कि मैंने आत्मा की आवाज को क्यों दबाई ? 

हमे जीवन मे कई बार ऐसे मोड़ आते है जहां हम सही निर्णय से मुकर जाते है । दिल की बात जरूर सुननी चाहिए ।अगर दोस्त के बेटे की शादी में सपरिवार मैं भी शामिल हुआ होता तो ऐसी अनहोनी घटना में प्रत्यक्ष प्रमाण से बच सकता था और मेरी जगह कोई और होता था ।



Sunday, June 14, 2020

स्वामी भक्त


   कहते है मनुष्य दुनिया का सबसे उन्नत और विकसित प्राणी है ।   जिसके पास दुनिया की सबसे बड़ी सुख सुविधाओं की अम्बार लगी होती है । दुनिया मे एक से बढ़ कर एक शक्तिशाली और निरीह जंतु है पर बहुत कम जीव जंतु चालाक किस्म के होते है ।

संक्षेप में जीव जंतुओं को नभचर , जलचर और स्थलचर के समूह में बांटा गया है । मनुष्य प्राणी का लगाव सबसे ज्यादा स्थलचर से रहा है । इन जीव जंतुओं पर मनुष्य का एकाधिकार सदैव कायम है । इन जीव - जन्तुओ को        मनुष्य  तरह - तरह से इस्तेमाल करता आ रहा है । ये निष्क्रिय जीव जंतु मनुष्य के क्रूरता के शिकार बनते रहे है । ज्यादातर जीव तो मनुष्य के आहार बन जाते है । इन मूक जीवों की आह शायद हमें श्राप भी देती होगी जिसे हम मानव समझने में देर भी कर देते है । मानव इस दुनिया का सबसे सचेत और उत्कृष्ट प्राणी होकर भी अपनी क्रूरता को नही छोड़ता । जो चिंतनीय है ।

       मैंने देखा है लोग गाय , भैंस या बैल या बकरी या भेड़ को मुर्गी के अंडे की तरह उपयोग करते है और जब काम निकल जाते है तो उन्हें कसाई के हाथों बेच देते है । इन जीवों को कैसा लगता होगा जब कसाई की छुड़ी उनके गर्दन पर चलती होगी ? उनके अन्तःमन से निकली हुई  मूक बददुआ के भागीदार भी तो हम ही है ।

         काश दुनिया का अनमोल प्राणी मनुष्य इतना निर्दयी न होता । इस धरा पर सभी जीव - जंतुओं को जीने का अधिकार है , जिसे छिनने का अधिकार किसी को नही ? क्योंकि जब हमारे पास जीवन देने की शक्ति नही है तो जीवन लेने का अधिकार किसने दे दिया ? हमे चाहिए कि प्रत्येक जीव को अपने जीवन तक भरपूर जीने दें !💐

         स्वामी भक्ति भी अजीब होती है । जो स्वामिभक्त होता है वह अपने प्यार और कर्म को अपने स्वामी के प्रति न्योछावर कर देता है । उसके रहने पर प्यार और जाने के बाद दर्द की धारा निश्छल रूप से बहने लगती है । ऐसा ही तो था मेरा प्यारा - लकी ।



          कहने को कुत्ता ( Labrador ) था पर एक परिवार या बेटे से कम नही था ।  उसका जन्म 04.04.2015 को अन्तपुर में हुआ था । वह एक माह की उम्र में हमारे घर मे प्रवेश किया था । बहुत ही प्यार और दुलार से हमने उसका पालन - पोषण किया था । लकी आज 18-05-2020 सुबह साढ़े आठ बजे मेरे बांहों में अपने जीवन का अंतिम सांस लिया था । मेरे नेत्र अपने आंसुओ को नही रोक पाए थे , मैं उसे बांहों में पकड़े हुए फफक फफक कर रो दिया था । एक प्यारा दोस्त और जिगर का टुकड़ा मुझे छोड़ चल दिया था । उसकी यादें - आंसू के साथ गीले हो जाती है । परिवार के सभी लोग एक अकेला पन महसूस करने लगे है । ये यादें - लकी की सुनहरी आंखे जो सदैव प्यार ही प्यार बरसाई करती थी - भविष्य में लंबे समय तक भूल पाना बहुत ही मुश्किल है ।

💐💐💐💐

आज के दैनिक पञ्चाङ्ग एवं चौघड़िया मुहूर्त
सोमवार, १८ मई २०२०
सूर्योदय : ०५:२३
सूर्यास्त : १८:४९
चन्द्रोदय : २७:२४
चन्द्रास्त : १५:०६
शक सम्वत : १९४२ शर्वरी
विक्रम सम्वत : २०७७ प्रमाथी
माह : ज्येष्ठ
पक्ष : कृष्ण पक्ष
तिथि : एकादशी - १५:०८ तक
नक्षत्र : उत्तर भाद्रपद - १६:५८ तक
योग : प्रीति - २८:३० तक
प्रथम करण : बालव - १५:०८ तक
द्वितीय करण : कौलव - २८:२० तक
सूर्य राशि : वृषभ
चन्द्र राशि : मीन
राहुकाल : ०७:०४ - ०८:४५
गुलिक काल : १३:४७ - १५:२७
अभिजितमुहूर्त : ११:३९ - १२:३३
दुर्मुहूर्त : १२:३३ - १३:२७
दुर्मुहूर्त : १५:१४ - १६:०८
अमृत काल : ११:३४ - १३:२२
चौघड़िया मुहूर्त
अमृत~०५:२३ - ०७:०४
शुभ~०८:४५ - १०:२५
चर~१३:४७ - १५:२७
लाभ वार वेला~१५:२७ - १७:०८
अमृत~१७:०८ - १८:४९
💐
आज का विचार 
श्रेष्ठ होना कोई कार्य नही बल्कि यह हमारी एक आदत है जिसे हम बार बार करते है।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
💐
      *अच्छे लोगों की इज्जत*
        *कभी कम नहीं होती*

     *सोने के सौ टुकड़े करो,*
            *फिर भी कीमत*
            *कम नहीं होती*।
💐
        *भूल होना "प्रकृत्ति" है,*
       *मान लेना "संस्कृति" है,*
*और उसे सुधार लेना "प्रगति" है.*
     🌹 *शुभ दिन*🌹
   💐 *जय श्री कृष्णा* 💐

लकी की कुछ निश्चल यादें - 

             मूक प्राणियों की कथा भी अजीब होती है । ये मुंह से कुछ नही बोल सकते परंतु इनकी तरह - तरह की भंगिमाएँ ,उनकी समझ को प्रकट कर देती है ।।

                 ये मेरा लकी पूरे परिवार का प्यारा था । बचपन से जैसे जैसे उम्र की ऊंचाइयों पर चढता गया था उसकी कारनामे अजीबोगरीब होती गयी थी। बहुत ही साफ सफाई का आदी । उसने कभी भी - रात हो या दिन , घर के अंदर पेशाब या टट्टी नही किया था । ऐसी आवश्यकता के समय वह मेरे पास आकर उकड़ू बैठ जाता था और एक टक लगाकर देखने लगता था । मुझे उसकी समस्या के अनुभव करते देर नही लगती थी और सिर्फ और सिर्फ मैं ही उसे बाहर ले जाता था । ऐसा नही करने पर उसकी भौक शुरू हो जाती थी ।



             घर का  हर सदस्य उसका दोस्त और वह सबका दोस्त था उसे दो तीन दिनों में स्नान करवाने पड़ते थे । स्नान करवाने की जिम्मेदारी भी मेरी ही थी। टॉवेल , शैम्पू देखते ही नल के पास खड़ा हो जाता था । बहुत ही इत्मीनान से स्नान करने का आदी था । हम सभी उसे अपने सामने पाकर अतीत के क्षणों को आसानी से भूल जाते थे । पलंग पर नजदीक बैठना, किसी के साथ सोना - ऐसे क्षण उंसके लिए अपार खुशी के होते थे । पलंग पर भले ही वह चढ़ जाये पर सोये हुए व्यक्ति को डिस्टर्व नही करता था । 

                       कुछ तस्वीरें मेरे बड़े पुत्र के साथ -




              अजीब सोंच और समझ थी उसकी । शायद इंसान में भी नही होती । मैं जब कभी रात को ड्यूटी से आने के बाद सो जाता था - तब सुबह सुबह लकी ही मुझे मॉर्निंग वॉक के लिए उठने के लिए विवश करता था । हम स्वतः सुबह 5 बजे उठ नही सकते अलार्म की सहारे लेने पड़ेंगे , पर वह बिल्कुल 5 बजे आकर पैर के पास बैठ जाता था और मुझे उठाने हेतु धीरे धीरे अपने पैरों से मेरे पैरों को कुरेदना शुरू कर देता था। मैं उठ गया तो ठीक अन्यथा वह भी बगल में सो जाता था । किन्तु कभी भी भोंक कर किसी को डिस्टर्व नही करता था । शायद वह जानता था कि भोंकने से सभी को असुविधा हो सकती है । 

                      कुछ उंसके बचपन के तस्वीर -

 








             मेरे पोते कुँवर सुशांत जी का जन्म दिवस के अवसर पर लकी जी को देखिए - कैसे परिवार के बीच बैठे है । केक काटने का सब्र उन्हें भी है 🎂


           कुत्ते बहुत ही स्वामी भक्त और सच्चे सेवक होते है । घर की रक्षा या स्वामी की सुरक्षा सच्चे मन से करते है ।आज तक हमारे घर की तरफ किसी ने भी आंख उठा कर देखने की हिम्मत नही की । मजाल है जो बिन अनुमति हमारे घर मे कोई प्रवेश कर जाए । आज लकी का प्रेम और यादें कुछ लिखने के लिए मजबूर कर दिया जिसे मैं रोक नही पाया । लेख लंबा नही करना चाहूंगा अतः अंत मे भगवान से यही कर जोड़ प्राथना करूँगा की लकी की आत्मा जहाँ भी हो उसे शांति ॐ प्रदान करें ।

            आज कभी कभी ऐसा लगता है कि उसके मृत्यु का कारण भी हम ही है । ख़ाने में कोई कमी नही थी । उसकी मोटापा उसे बीमार बना दी थी । वह कई दिनों से आहार लेना बंद कर दिया । इलाज भी कराया गया था किंतु उसे कैंसर हो गया था । इसे समझने में हमने बहुत देर कर दी थी । इसका दुख सदैव रहेगा । उसे हमने घर के सामने बगल में ही समाधि दी । उंसके याद में समाधि के ऊपर एक वृक्ष लगा दिए है ।




💐💐 लकी को एक श्रद्धांजलि 💐💐 



Monday, January 20, 2020

सब कुछ ठीक हैं क्या ?

मतदान के पूर्व किसी सरकार के फ्री आफर , दोनों हाथों से धन का अपार व्यय या लोकलुभावन कार्य के निम्न कारण होते है -
1. पब्लिक को अपने तरफ आकर्षित करना 

2.अपने दूसरे कार्यकाल को सुनिश्चित करना 

3.हार जाने के पूर्व खजाने खाली करके जाना ।

4.अगर जीत गए तो चार वर्ष लूट , तीसरे कार्यकाल को बोनस अंक समझना ।जीते तो भी ठीक , हारे तो भी ठीक ।

5. अगर हार गए तो आने वाली सरकार के लिए समस्या जिंदा रखकर जाना ।

6.हारने के बाद अपने लिए मुद्दा जिंदा रख कर जाना क्योंकि आने वाली सरकार फ्री को ज्यादा दिनों तक नही चला पाएगी ऐसी हालत में इन्हें जिंदा मुर्दा मिल जायेगा - देखो मैने फ्री दिया था इन्होंने बंद कर दिया ।

7.आने वाली सरकार उस खर्च को पूर्ति में व्यस्त रहेगी और कुछ नई करना मुश्किल होगा । और इन्हें उस सरकार को घेरने के लिए आसानी से मुद्दा मिल जाएगा ।

8.पिसेंगे पब्लिक क्योंकि इन्हें मालूम है पब्लिक अंधी है और नेक्स्ट टर्म फिर इनका ही होगा ।

9.उपरोक्त सठीक है या गलत - अपने अपने राजनीति पर निर्भर करता है । पिसती तो पब्लिक ही है , फिर भी कहते है पब्लिक सब जानती है ।

10.खाक जानती है - एक नेता का धैर्य ने कहा ।

समझदारी का परिचय दीजिये । जागरूक नागरिक , ससक्त देश । तभी विश्व सलाम करता है ।।

Friday, August 10, 2018

पत्रकार की अस्मिता ( लघु कथा )


सरकार बदल चुकी थी । नई सरकार का होना और उनके कार्यक्रम से बिदित था कि यह सरकार कड़क चाय की प्याली है । पत्रकारों के चैनलों की टीआरपी घटने लगी थी । लोगो का विश्वास सरकार के प्रति बढ़ चला था ।चोर उचक्के अपने सुरक्षा के प्रति जगह ढूंढने लगे थे । विरोधियों के बेचैनी थी क्युकी जनता ने उनके कर्मो की सजा दे चुकी थी ।टीवी वालो की चिंता टीआरपी पर थी । आज आवश्यक मीटिंग में यह कार्यक्रम पेस हुए की टीआरपी बचाने के लिए कोई स्टिंग की जाय जो सरकार की कमजोरी उजागर करे । मंथन जारी था ।

सवाल यह था कि सरकार के विरोध में कोई भी कर्मचारी स्टिंग के लिए तैयार कैसे होगा ? एक पत्रकार ने धीरे से कहा - चिंता न करें । काम हो जाएगा । आप स्टिंग की तैयारी करें ।

सदानंद टीवी के सामने बैठकर समाचार देख रहा था । आज स्टिंग की समाचार आने वाली थी । पत्नी  नाश्ते की प्लेट के साथ हाल में हाजिर हुई । स्टिंग ऑपरेशन प्रसारित होने लगा । सदानंद और पत्नी की आंखे टीवी स्क्रीन पर टिकी हुई थी । अरे ये क्या ? आप की तस्वीर दिख रही है - पत्नी कुछ सहमी सी आश्चर्य के साथ बोली । हां भगवान मै ही हूं । 

तो क्या आपने अपने विभाग के खुफिया जानकारी को लिक करने लगे  है ? पत्नी का सवाल सुन सदानंद कुछ मंद मंद मुस्कुराया और बोला - क्या हो गया । विभाग मे बहुत ही भ्रष्टाचार व्याप्त है  , किसी को तो सामने आना चाहिए ? 

तभी अगली समाचार दोनों की आंखो के तैर गई । विभाग का एक अफसर संवाद दाता से मुखातिब होकर कह रहा था - सरकार सभी शिकायतों की जांच करवाएंगे । हमने सदानंद को तुरंत निलंबित कर दिया है ।

पत्नी को जैसे लकवा मार दिया । अब क्या होगा । विभागीय कार्यवाही होगी । सदानंद की नौकरी खतरे में । झिल्लते हुए बोली - अब क्या होगा ? हमेशा उल्टा पुल्टा कार्य करते रहते है ।

सदानंद मंद मंद मुस्कुराते हुए उठा और अपना ब्रीफकेस लाकर पत्नी के समक्ष रख दिया । बोला _ खोलो ? पत्नी की आंखे फटी रह गए । ब्रीफकेस नोटों से भरा हुआ था । 

पूरे एक करोड़ है । नौकरी का डर नहीं ।जीवनभर नौकरी करने के बाद भी सरकार का सेटलमेंट इतना नहीं आएगा । सदानंद ने पत्नी से कहा । पत्नी धीरे से बोली - तो यह है स्टिंग की उपहार । तुम बड़े वो हो जी । मुझे आज हार और कंगन खरीद दीजिए ।

( इससे सत्य का कोई तलुकात नहीं अगर होता है तो प्राकृतिक । सोने का देश किन्तु चिंतनीय ।)

Thursday, December 21, 2017

इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन ट्रेनिंग सेंटर / विजयवाड़ा

जैसा कि मैं रेलवे में लोको पायलट हूँ । पिछले कई वर्षों से राजधानी एक्सप्रेस में कार्यरत हूँ । उच्च पद पर पहुंचना अपने आप मे एक भाग्योदय का प्रतीक माना जाता है । किन्तु इसके साथ ही तरह तरह की नई जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती है अगर आप ईमानदार और अनुशासित है , तो किसी तरह के डर की गुंजाइश नही । भ्रष्ट लोगो को हमेशा डर घेरे रहता है । भ्रष्टाचार एक नासूर है जो जीवन मे तरह तरह की परेशानियों के मूल कारण  है । किसी भी तरह के डर दिल मे अशांति पैदा करती है। अतः जीवन मे अशांति का कोई स्थान नही होनी चाहिए ।

 जीवन मे खुशी का माहौल हमे स्वास्थ्य प्रदान करते है । इसीलिए कहा गया है कि खुश रहें और दूसरो को भी खुश रखें ।


लोको पायलट का जीवन बिन अनुशासन व्यर्थ ही है । हमारे कार्य ही ऐसे होते है कि बिना अनुशासन के सुरक्षा और संरक्षा संभव ही नही है ।  यदि आप के साथ कोई दुर्घटना हो जाती है , तो इंक्वायरी नियम और कानून के दायरे में ही घुमाती रहती है । उस समय कोई भी लोको पायलट की मदद नही कर सकता। लोको पायलट को स्वतः अपनी बचाव करने पड़ते है । इसके लिए एक ही चीज काम आएगी और वह है - अनुशासन पूर्वक किया गया कार्य । दोस्तो , लोको पायलट का जीवन जितना कष्टकर है उतना ही आनंदायक भी । 

आप एक बार ड्यूटी से मुक्त हुए और दूसरी ड्यूटी तक फ्री रहेंगे । आप को कोई भी कुछ कहने वाला नही मिलेगा  । वैसे देखा जाय तो कोई भी कार्य बिना रिस्क का नही होता है । योग्य और अनुभवी  रिस्क को भी अंगुली पर नचाते है ।

मेरे पास बहुत सारे फोन या व्हाट्सएप्प के माध्यम से संदेश आते रहते है , जो प्रायः नौजवानों के होते है । दसवीं पास या कुछ और पढ़ाई करने वालो के ज्यादा  । उन सभी के एक ही प्रश्न होते है कि लोको पायलट बनने के लिए शैक्षणिक योग्यता क्या है ? मुझे भी लोको पायलट बनना है , इसके लिए क्या करूँ ? अतः मैने व्हाट्सएप्प पर एक ग्रुप बना रखी है । इसमे उन सभी युवको को जोड़के रखता हूँ , जिन्हें लोको पायलट बनने के लिए  विस्तृत जानकारी चाहिए । अतः कोई भी युवक मुझसे फोन या व्हाट्सअप के माध्यम से संपर्क कर सकते  है ।

अब आइये एक दर्दभरी दास्तान सुनाता हूँ 

 मैं राजधानी एक्सप्रेस में कार्य करता था । उस समय राजधानी डीजल लोको से चलती थी । पहली जुलाई 2017 से  इलेक्ट्रिक लोको उपयोग में है लाया गया है चुकी मुझे इलेक्ट्रिक लोको की ट्रेनिंग नही थी , इसीलिए विजयवाड़ा ट्रेनिंग सेंटर में , जाने पड़े । मैं 7 जुलाई 2017 को ट्रेनिंग सेंटर में रिपोर्ट किया था । ट्रेनिंग का कार्यकाल 66दिनों का था । मेरे क्लास में लोको पायलट थे जो अलग अलग डिपो से ट्रेनिंग के लिए आये थे । ट्रेनिंग में आने के पूर्व ही एक हौआ फैला हुआ था कि इलेक्ट्रिक ट्रेनिंग बहुत हार्ड होती है । यह सबके बस का नही है । खैर जो भी हो हमारी ट्रेनिंग शुरू हो चुकी थी । दिनोदिन की शिक्षा उस हौवे को सही साबित कर रही थी । 10 दिनों तक तो बहुत असुविधा महसूस  हुआ किन्तु  धीरे धीरे कुछ आरामदायक और नॉर्मल होने लगा  । वैसे  नया विषय हमेशा कठिन ही लगता है । 

हमारे ट्रेनिंग के प्रोग्राम - 

कन्वेंशनल लोको की जानकारी , सिम्युलेटर ट्रेनिंग और थ्री फेज लोको की जानकारी थी । इसके अंतराल में ऑन लाइन प्रैक्टिकल ट्रेनिंग भी थी । सभी सुचारू रूप से चल रहे  थे । रोज चार पीरियड , कम से कम डेढ़ घंटे  कि होती थी को अटेंड करने होते थे  । हमारे इंस्ट्रक्टर श्री के कल्यानराम जी थे । जो पूर्व के लोको पायलट ही थे । मेहनती तो थे ही , क्लास में आते ही , पहली पीरियड वार्तालाप पर आधारित था , जिसमे वे पिछले दिनों पढ़ाई हुई विषय पर प्रश्न करते थे । बारी बारी से सभी को उत्तर देना पड़ता था । उम्र दराज वाले  उत्तर न दे पाने पर शर्म महसूस भी करते थे । बहाने भी बना देते थे कि   हमारी उम्र पढ़ने की नही है । हमारी याददाश्त भी कमजोर है । रोज की यह   प्रक्रिया ,  बहुतो के मन मे टेंशन उत्तपन्न कर दिया । बहुत से लोको पायलट हमेशा टेंशन में रहने लगे थे ।

मुझसे जो भी मिलता , उसे मै  समझाने की प्रयास करता था । धीरे धीरे सब आसान हो जायेगा । एक दिन की बात है रवि रंजन और धनंजय कुमार सिम्युलेटर ट्रेनिंग में गए । उनकी क्लास सुबह 6 बजे लगी । प्रायः दो घंटे की थी । प्रैक्टिकल ट्रेनिंग हेतु बाकी लोग विजयवाड़ा ट्रिप शेड में चले गए । हम लोग ट्रेनिंग के लिए एक लोको के अंदर थे । लोको के औजारों के मुआयने कर रहे थे । कुछ समय बाद लोको से बाहर आ गए । पानी पीने के लिए आफिस के तरफ बढ़े । तभी एक सहपाठी मेरे नजदीक आया और पूछ - " सर कुछ मालूम है ?"   मैने  पूछा - क्या ? तब तक दूसरे सहपाठी ने कहा कि - रवि रंजन को हार्ट अटैक आया है । अभी रेलवे अस्पताल में है । मैने अपने मोबाइल पर नजर दौड़ाई ? देखा हमारे इंस्ट्रक्टर कल्यानराम का मिस कॉल था । बजह साफ जाहिर हो चुका था । मैंने तुरंत उन्हें कॉल किया । कल्यानराम जी कॉल रिसीव किये और तुरंत अस्पताल आने को कहा । 

हम सभी लोग रेलवे अस्पताल की तरफ चल पड़े । आज दिनांक 17-08-2017 था । हमने देखा - प्रिंसिपल से लेकर सारे इंस्ट्रक्टर अस्पताल में मौजूद थे । पता चला कि रवि रंजन अब इस दुनिया मे नही रहे । 35 वर्ष के आस पास की आयु और इस तरह का हार्ट अटैक सभी को सोचने के लिए बाध्य कर रहा था । एक माह पूर्व ही वह एक बेटे का पिता बने थे । इस घटना की जानकारी रविरंजन के गॉव को बता दिया गया । रविरंजन बिहार के रहने वाले थे । रेलवे की नौकरी भी कोई ज्यादा दिन की नही थी । यही कोई 8 वर्ष के आस पास । 

यह समाचार सभी डिपो में आग की तरह फैल गयी । व्हाट्सएप्प का जमाना जो है । विजयवाड़ा /रायचूर में उनका कोई नही था । अतः मेडिकल डिपार्टमेंट के अनुरोध पर उनके तीन रिश्तेदार गांव से एक दिन बाद आये । कागजी कार्यवाही / पोस्टमॉर्टम के बाद उनके पार्थिव शरीर को तीन सह कर्मियों  की देख रेख में , विमान द्वारा पटना भेज दिया गया । उनके परिवार और पत्नी पर क्या गुजरा होगा ? हम आसानी से समझ सकते है । लेकिन जिसे मौत आ जाये , कोई नही बचा सकता ।

इस घटना के बाद ट्रेनिंग स्कूल विवादों में घिर गया । कई ट्रेड यूनियनों ने इन्क्वायरी की मांग की । तो किसी ने हमारे इंस्ट्रक्टर के ऊपर दोषारोपण भी कर दिए , शायद कुछ लोगों की नजर में उनका  स्ट्रीकर व्यवहार ही इस मौत का कारण बना हो । कहने वाले हजार कहेंगे । किन्तु ये भी सत्य है कि ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट में कोई किसी को क्यों मारेगा । कुछ दिनों तक विवाद बढ़ने की आशंका थी पर धीरे धीरे सब शांत हो गया ।


  • इस तरह के कटु सत्य और अनुभव जीवन मे आते ही रहते है । संक्षेप में कहे तो मौत के कारण नही होते , जबकि मौत एक जीवन की सम्पूर्ण यात्रा है जो स्वयं आती है , इस पर किसी का दबाव नही होता । जीवन में धैर्य और शांति से ही सुखमय जीवन का लाभ मिल सकता है । हम ही हमारे जीवन के रखवाले है । आएं बिना दोष के जीवन जीने की आदत डालें ।

Wednesday, May 31, 2017

माँ वैष्णो देवी यात्रा - 6

आज 10 मई 2016 , दिवस मंगलवार है । दिल्ली से कोपरगाँव के लिए झेलम एक्सप्रेस में सीट रिजर्व था । सुबह जल्दी तैयार हो गए । बोर्डिंग नयी दिल्ली स्टेशन से थी ।  होटल से रेलवे स्टेशन काफी नजदीक ही है , फिर भी ऑटो वाले एक सौ रुपये की मांग रख रहे थे । अजीब है कमाई ! दुनिया में ईमानदारी भी कोई चीज है या नहीं । एक दूसरे ऑटो वाले ने 50 रुपये में रेलवे स्टेशन तक पहुंचा दिया । सुबह नाश्ते की आदत है । रेलवे स्टेशन के सामने ही एक तमिल वाले  की दुकान दिखाई दी । ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि यहाँ अच्छे नास्ते की संभावना थी ।

हम दुकान में प्रवेश किये । हम सभी , जिसे जो खाने की इच्छा थी   , उसकी फरमाइश पेश कर दिए  । इडली , डोसा , पोंगल यानि हर दक्षिण भारतीय नास्ते उपलब्ध थे । पर एक विशेषता यह दिखी की सभी आइटम  टेस्टी भी थे  । बिलकुल दक्षिण भारतीय होटलो की तरह । साफ सुथरा नार्मल था और बिल भी वाजिब । आज बहुत दिनों के बाद कुछ स्वादिष्ट खाने के लिए मिला था ।

मैं आज बहुत आनंद महसूस किया । हमारी ट्रेन समय से आधे घंटे लेट थी । हमने दोपहर का आहार भी इसी दुकान से लेनी चाही किन्तु इसके लिए और 2 घंटे wait करने पड़ेंगे । हमारे पास समय नही था । अतः ट्रैन में ही ले लेंगे , की आस पर प्लेटफॉर्म में आ गए । जैसा कि सर्व विदित है कि कुछ ट्रेनों में पेंट्री कार होते है जो यात्रियों को खाने पीने की सामग्री की व्यवस्था करते है । इस सुविधा के पीछे रेलवे की धारणा यही है कि इससे यात्रियों को उचित दर पर खाने - पीने के बस्तुओं की व्यवस्था हो पाएगी । आज कल रेलवे इसे ठेकेदारों के माध्यम से प्रायोजित करता है । किसी भी क्षेत्र में ठेकेदारों के क्या योगदान है सभी जानते है । एक तरह से ये प्रथा एक कानूनी लूट को ही इंगित करती है । जहां भी ठेकेदारी है वहाँ गुडवत्ता का अभाव और लूट ज्यादा है । जनता परेशान और प्रशासन मस्त रहते है ।

मेरे विचार से ठेकेदारी सरकारी तंत्र में मलाई खाने का एक आसान साधन है । सरकारी तंत्राधीश नजराने लेते है और ठेकेदार को एक के माल को नौ के भाव पास कर देते है । ठेकेदारों और सरकारी तंत्रकारो के मकड़ जाल ऐसे होते है कि कोई उनके विरोध में आवाज नही उठता है । इसके स्वप्निल रूप चित्रपट में प्रायः  दिखते है । आईये झेलम एक्सप्रेस के ठेके ( पैंट्रीकार ) के ऊपर एक दृष्टि डालें -

पैंट्रीकार वाले अग्रिम आर्डर ले लेते है । उस दिन भी वैसा ही हुआ । एक युवक दोपहर के भोजन का ऑर्डर लेने के लिए हमारे सीट के पास आया । हम ऐसी two टायर में थे । उसने वेज खाने की कीमत 120 रुपये बतायी । मुझे गुस्सा आ गया । वेज खाना इतना महंगा और मात्रा भी काफी कम होते है । मैंने उससे मेनू लाने के लिए कहा । कुछ समय बाद वह एक पेपर लेकर आया जिसमे तरह तरह के व्यंजन और उनके कीमत अंकित थे । वेज का कीमत 120 रुपये ही था । 120 रुपये में कौन सी सामग्री सर्व होगी , सब कुछ था । हमारी मजबूरी थी । 3 खाने का आर्डर दे दिया गया । करीब डेढ़ बजे दोपहर को खाने के पैकेट हमे दिया गया । सबसे पहले पुत्र जी ने एक पैकेट खोले और भोजन की शुरुवात की । आहार में कोई टेस्ट नही था । चावल के दाने काफी मोटे मोटे तथा लिस्ट के मुताबिक व्यंजन नही दिए गए थे । ऊपर की तस्वीर देंखें ।

कीमत के अनुसार अव्यवस्था देख मुझे बहुत गुस्सा आया । मैंने रेलवे मंत्री को ट्वीट करनी चाही किन्तु नेट की असुविधा से ऐसा न कर पाया । जब पैंट्रीकार के प्रबंधक को मालूम हुआ तो वह और टीटी भी आये । प्रबंधक ने क्षमा मांगी और बहाने में कहने लगा कि गलती से ये आप के पास आ गया । मैं उनके बहाने बाजी समझता था । भोजन वापस कर दिया । मैने उन्हें बता दिया कि इसकी ऊपर शिकायत करूँगा । प्रबंधक सहम गया । उसने पैंट्रीकार से टी और ब्रेड भिजवाई । ताकि मैं शिकायत न करूँ । मैंने अस्वीकार कर दिया और बड़े पुत्र को फोन लगाया । दूसरे तरफ से पुत्र ने फोन उठायी । मैन उन्हें पूरे किस्से बताए और घर से रेलवे को शिकायत भेज देने के लिए कहा । पुत्र ने ऐसा ही किया । शिकायत दर्ज हो गयी और शिकायत नंबर मेरे मोबाइल पर आ गया ।

PNR 2858871469
TN 11078
Date of journey 10.05.2016
NDLS to KP G
Meals quality and stranded very bad. Veg.
And even though they are about to charge Rs 120/-
I did not had and returned it due to.
advised TTE also on duty .
That type of meals even we are not feeding to our dog in home.

एक सप्ताह बाद मुझे रेलवे के कार्यालय ( दिल्ली ) से फोन आया । फोनकर्ता ने शिकायत की पूरी जानकारी पूछी । मैंने पूरी कहानी सुना दी और कहा कि ऐसा भोजन मेरा कुत्ता भी नही करता है । विश्वास न हो तो मेरे घर आकर जांच पड़ताल कर लें । किन्तु दूसरे तरफ से कोई उत्तर नही मिला । फोनकर्ता ने कार्यवाही करेंगे , कह कर फोन काट दी । कुछ दिन के बाद मुझे एक एस एम एस मिला । जो रेलवे का था । उसमें लिखा था कि झेलम एक्सप्रेस के ठेकेदार पर दस हजार का जुर्माना लगाया गया है । इस समाचार के बाद कुछ सकून मिला ।

इसके पहले एक समाचार पत्र में भी पढ़ा था कि रेलवे के महाप्रबंधक ने झेलम एक्सप्रेस के पैंट्रीकार की औचक निरीक्षण किया तथा अनेक अनिमियता देखी । ठेकेदार पर पचास हजार का जुर्माना ठोका ।

जी हां । रेलवे आप को सतत  उचित सेवा देने के लिए प्रयासरत है । क्या आप रेलवे की मदद करेंगे ?

अभी भी  न्याय जिंदा है ।

Sunday, March 19, 2017

लघु कथा - नोटबंदी पार्ट -2

मैं आज टी वी के सामने बैठा हुआ था । ऑफिस में बहुत देर हो गयी थी । सामने अखबार पड़ा हुआ था । ऑफिस में काम से कहा फुर्सत मिलती है । एक नजर दौड़ाई । देश और दुनिया में शांति से ज्यादा अशांति ही दिखाई दी । मैडम चाय लेकर आई । सामने रख दी । चाय की चुस्की लेते हुए टीवी की ओर देखा । साढ़े आठ बज रहे थे ।

देखा मोदी जी का कोई संबोधन प्रसारित हो रहा था ।
मोदी जी कह रहे थे -

" भाईयो और बहनों ,
आप ने देखा कि देश के भ्रष्टाचार को कम करने के लिए मैंने नोटबंदी का सहारा लिया । जिससे छुपे हुए कालाधन बाहर आ सके । यह आंशिक रूप से सफल और कारगर साबित हुआ है । फिर भी बहुत से कालाबाजारी कुछ बैंक की मदद से अपने छुपे धन को सफ़ेद करने में  कामयाब रहे । मैं उन्हें छोड़ने वाला नहीं । सभी पर कार्यवाही होगी और जरूर होगी ।
आज बारह बजे रात से कोई भी नोट कार्य नहीं करेगा । जिनके - जिनके पास नए 2 हजार और 5 सौ के नोट है , वे कल बैंक में जाकर अपने खाते में जमा करवा दें । पुराने नोट को अपने खाते में कोई भी सिर्फ एक बार जमा कर सकेगा । पुराने नोट एक ही खाते में दुबारा स्वीकार नहीं किये जायेंगे । 

यह  सुविधा 5 दिनों तक लागू रहेगा ।

50 हजार से ज्यादा जमा का लेख जोखा देना होगा अन्यथा स्वीकार नहीं किये जायेंगे । अब एटीएम से प्लास्टिक के नए नोट मिलेंगे ।

भाईयो और बहनों - 

मुझे आशा है आप लोग मेरे इस कार्यवाही को नोटबंदी एक की तरह  सहर्ष स्वीकार करेंगे । बाकी जानकारी बैंक वाले बता देंगे । आप सभी का धन्यवाद 
बन्दे मातरम भारत माता की जय ।" 

मेरे शरीर में सिहरन समा गयी । ये क्या नोटबंदी 2 आ गया ? ओह माय गॉड । मैं तो मर गया । 15 लाख कैश घर में रखे पड़े है । अब क्या होगा । लक्ष्मी लक्ष्मी लक्ष्मी दौड़ो ? 


पत्नी ने जोर से झटके दी । अरे सोये सोये ये क्या चिल्ला रहे थे । मैंने अपनी आँख को रगड़ते हुए कहा - " लक्ष्मी आज मैंने बहुत बुरी स्वप्न देखी है । देखा - मोदी जी ने नोटबंदी 2 लागू कर दी है । भगवान न करे ये कही सही हो जाय । लक्ष्मी जल्दी से तैयार हो जाओ । बैंक चलने है । मैंने पत्नी से अनुरोध किया । 

क्यों ? पत्नी ने एक झटके में पूछा । 

भाग्यवान , तुम मेरी लक्ष्मी हो । अलमारी में 15 लाख रखे है । कृपया अपने खाते में जमा करा दो । मैंने प्यार से गुहार किया । 

आखिर 15 लाख आये कहाँ से ? बोलो ना ? पत्नी जानने हेतु जिद्द करती रही । न चाहते हुए भी बताना पड़ा । कहा - " मोदी जी ने कर्मचारियों के वार्षिक इंक्रीमेंट के लिए - वैरी गुड - सर्विस रिकॉर्ड में होना अनिवार्य कर दिया है । अतः मैंने अपने अंतर्गत कर्मचारियों से 1 से लेकर 3 हजार तक बसूले है वैरी गुड रिमार्क के लिये । " 

पत्नी के मुख से निकले - पापी कही के । इतना कह पत्नी बाहर की ओर जाने लगी । मैं जाती हुई लक्ष्मी को आश्चर्य से देखता रह गया ।

( नोट - यह एक काल्पनिक लघु कथा है । सत्य से कोई सरोकार नहीं । )

Friday, February 10, 2017

माँ वैष्णो देवी यात्रा -5

हम जम्मू अपने रिश्तेदार के घर  लुधियाना आ गए थे । यहाँ पर एक दिन रुकने के बाद , अब यहाँ से नई दिल्ली जाना था। लुधियाना शहर अपने उद्योगिक राजस्व के लिए प्रसिद्द है ।यहाँहर किस्म की छोटी बड़ी फैक्ट्री मिल जायेगी । इसकी उत्पादन क्षमता पुरे भारत ही नहीं विदेशो में भी फैली हुई है । लुधियाना के बारे में जितना भी लिखा जाए वह कम ही होगा । 8 मई 2016 , रविवार को गोल्डन टेम्पल एक्सप्रेस ( 12904 ) से नयी दिल्ली के लिए रवाना हो गए । 9 मई 2016 को सुबह 7 बजे हजरत निजामुद्दीन स्टेशन पर उतरे क्योंकि यह ट्रेन नयी दिल्ली होकर नहीं चलती है । हमें योजनानुसार किसी के घर न जाकर , नयी दिल्ली के किसी होटल में ठहरना था । 


हजरत निजामुद्दीन से नयी दिल्ली के लिए रोड और रेल यातायात से बहुत से साधन है । ट्रैन से जाने का प्रोग्राम था किंतु एक टैक्सी वाले ने हमें 50/- में नयी दिल्ली पहुचाने की ऑफर दी । मुझे कुछ आश्चर्य भी हुआ । कानो को जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था  । कही ये धोका तो नहीं देना चाहता ? अनायास ही मन में संदेह उपजे । जीवन में कभी भी 50/- में दोनों स्टेशन के बीच यात्रा नहीं की थी । हमने उससे कहा - चलो । उसने एक आज्ञाकारी नौकर की तरह सामान उठा लिए और चल पड़ा । आगे आगे वो और पीछे पीछे  हम । कारो - टेम्पो की झुंडों से होते हुए , हम आगे बढ़ रहे थे । उसकी कार , पार्किंग के एक कोने में खड़ी थी । हम कार में सवार हुए और हमारी यात्रा शुरू हो गयी । चुकी दिल्ली दर्शन के लिए रुक रहे थे , सोचा कार वाले से ही कुछ जानकारी भी ले ली जाये । 

मैंने कार वाले से पूछा - दिल्ली घुमाने के लिए कितना भाड़ा है ? उसने उत्तर के वजाय मुझसे ही प्रश्न कर दिया - दिल्ली घूमना है क्या ? 
मैंने कहा - हाँ जी । 
साहब ऐसी या नॉन ऐसी , किस तरह का चाहिए ? 
गर्मी है ऐसी चाहिए । मैंने सहज में ही कह दिया । साहब ऐसी के 1800/- रुपये और नॉन ऐसी के 1500/- रुपये लगेंगे । उसने बड़े ही आत्मीय ढंग से कहा जैसे हम उसके सगे हो । ज्यादा है भाई । टूरिस्ट बस से तो ,  सौ दो सौ में बात बन जायेगी । मैंने भी अनायास  ही कह दिया । साहब सब कुछ महंगा हो गया है । पेट्रोल डीजल महंगा है । रास्ते  में पुलिस वाले है । पार्किंग खर्च है । सभी तो देखना पड़ता है । खैर हमें तो दिल्ली घूमना था । उससे बात पक्की कर ली । कम नहीं किया । कार को एक होटल के पास रोका - पहाड़गंज का क्षेत्र । होटल अच्छा था साफ सुथरा । श्रीमती जी को पसंद आया । वैसे भी घरेलु रहन - सहन तथा घर कैसे हो ? मर्दो से बेहतर औरते ज्यादा जानती है । मर्द पिछड़ जाते है क्यों की वित्तीय घोटाले नहीं करना चाहते ।

नित्य क्रियाकर्म और नास्ते के बात हम होटल से बाहर आये । उस टैक्सी चालक का पता नहीं था । होटल का मैनेजर सामने आया और कहा -" वह ड्राइवर चला गया । मैंने उसके भाड़े 50/- रुपये दे दिए है । आप मुझे दे दीजिए और दूसरी कार रेडी है । ये है ड्राइवर । उसने एक नाटे व्यक्ति की तरफ इशारा किया । ये आप को पूरी दिल्ली घुमा देगा । " मैंने संसय में पूछा - और भाड़े कितने ? मैनेजर बोला - जो पहले तय हुयी थी , उतना ही  ।

दिल्ली के मुख्य दर्शनीय स्थल - 

 लाल किला , जामा मस्जिद , विजय घाट , शांति वन , शक्ति स्थल , राजघाट , गांधी म्यूजियम , कोटला फिरोज शाह , इंडिया गेट , क़ुतुब मीनार , तीन मूर्ति , इंदिरा गांधी मेमोरियल हाल , राष्ट्र पति भवन , पार्लियामेंट हाउस , बिरला मंदिर , लोटस टेम्पल , अक्षर धाम मंदिर , रेल म्यूजियम वगैरह वगैरह । 


कार ड्राइवर बिरला मंदिर से दर्शन की शुरुआत की । ड्राइवर  बिच बिच में चुटकुले भी कहने शुरू का दिए थे । ये अच्छे लगते थे । समय व्यतीत होने के लिए जरुरी भी थे । एक जगह कार ड्राइवर हमें एक इम्पोरियम में ले जाने की इच्छा जताई । हमने जाने से मना कर दिया । हमें मालूम था कि वहाँ लेने के देने पड़ते है । ये टूरिस्ट कार वाले मिले होते है । इसके पीछे इनके कमिसन रखे होते है । कई बार हम ठग भी चुके है । उसने हमारी एक न मानी और अनुरोध करने लगा की एक बार आप जाये , कुछ न लें बस । हमने उसकी एक न मानी । अंत में उसे आगे ही बढ़ने पड़े । 

क़ुतुब मीनार के पास गए । यहाँ अंदर जाने के लिए टिकट लेने पड़ते । टिकट खिड़की पर गया । मैंने देखा टिकट काउंटर पर बैठा व्यक्ति सबसे ख़ुदरे रुपये पूछ रहा था । सभी परेशान हो रहे थे । मेरी बारी आई । मेरे साथ भी वही व्यवहार । मुझे तुरंत गुस्सा आ गया । उसे बहुत कुछ कह दिया । वह निरुत्तर सा हो गया , मुझे टिकट आराम से दे दिया । क़ुतुब मीनार ही दर्शन की प्रमुख टारगेट था , मैडम जी का । अंदर में भ्रमण हुई । कई जगह पिक और वीडियो लिए गए  । 

दोपहर के भोजन भी कार ड्राइवर के निशानदेही होटल में ही हुई । हम ठहरे दक्षिण भारतीय रहन - सहन वाले । भोजन रास न आये । पर जीने के लिए तो जरुरी है । काश कोई फल फूल खा लिए होते , तो ही अच्छा होता । दिल्ली दर्शन  के दौरान हमने पाया कि बहुत से दर्शनीय स्थल सोमवार को बंद थे । हमारे मनसूबे पर पानी फिर गए । जो खुले थे वे है - विजय घाट , शांति वन , राजघाट , शक्तिस्थल , इंडिया गेट , क़ुतुब मीनार , बिरला मंदिर । इन्हें देख के संतोष करने पड़े । बाकी सब बंद थे ।  कार ड्राइवर को भी पता था , पर उसने कोई सूचना नहीं दी थी । बालाजी के लिए दिल्ली का दर्शन महत्वपूर्ण था । हम तो कई बार देख चुके है । फिर कभी आएंगे , सोमवार को छोड़ , कह आज की दर्शन यात्रा को विराम देनी पड़ी । 

दोस्तों , किसी भी दर्शनीय स्थल पर जाने के पूर्व , वहाँ के बारे में पूरी जानकारी कर लेनी जरुरी होती है । ये जानकारी दोस्तों , रिस्तेदारो या आज कल नेट से प्राप्त की जा सकती है । अन्यथा परेशानी और व्यर्थ के समय बर्बाद होंगे ही और पैसे भी । नए शहर में नए लोग तुरंत पहचान में आ जाते है अतः किसी  पुलिस स्टेशन का मोबाइल नंबर साथ हो , तो किसी भी अनहोनी या ठगी से बचा जा सकता है । वैसे पुलिस स्टेशन के लफड़े से ज्यादातर दूर ही रहना चाहिए क्योंकि पुलिस थाने  भरोसे के स्थल नहीं है । ये ज्यादा उचित होगाकि दिल्ली दर्शन के लिए  सोमवार को न जाए या जो दर्शन करना चाहते है वह किस दिन उपलब्ध है इसकी पूरी जानकारी कर लें । पर्यटन स्थल पर खरीददारी न करें । सामान कोई खास नहीं पर भड़कीले होते है जो पर्यटक को बरबस आकर्षित करते है । वैसे आप जो ख़रीदारी करना चाहते है वह आप के शहर में भी मिल जायेंगे तथा रास्ते भर उस सामान को ढ़ोने की समस्या से भी निजात मिलेगा  । हाँ यात्रा का पड़ाव हो तो खरीद सकते है । वैसे पसंद अपनी अपनी । पैसे अपने अपने । कार चालको से भी सदैव सतर्कता बरतनी चाहिए ।

जैसा की मैं रेलवे में चालक हूँ । एक बहुत ही जिम्मेदारी भरा ड्यूटी करना पड़ता है । परिवार , समाज , ऑफिस और कार्यस्थल के सभी ड्यूटी को सुरक्षित संपादन के लिए वक्त के पाबंद है हम । कुछ के लिए समय को बचाने पड़ते है । यही वजह है कि सुचारू ढंग से ब्लॉग पर पोस्ट न दे पा रहा हूँ । बहुत से पाठक फोन या व्हाट्सएप्प पर सवाल करते रहते है कि अगली पोस्ट कब आ रही है । ऐसे फ़ैन को तहे दिल से धन्यावाद तथा देर लतीफी के लिए दिल से क्षमा प्रार्थी हूँ । आप के प्यार और लगाव को मेरा सत सत नमन । 

( आगे की यात्रा के बारे में जानकारी के लिए पढ़िए - 
माँ वैष्णो देवी यात्रा - 6 ) 



Sunday, December 4, 2016

फ़ैन


मैंने शाहरुख खान की फिल्म फैन देखी थी , लुधियाना में । एक फैन और मशहूर अभिनेता की कहानी है । फैन अपने अभिनेता के प्रति आक्रामक हो जाता है , जब उसे अपने चहेते अभिनेता से साक्षातकार के अवसर नहीं मिलते । ऐसे ही कई फैन है जिनके फोन या टिप्पणियां हमेशा मुझे मिलती रहती है । आज एक फैन से मुझे एक कहानी प्राप्त हुई  है , जो हमारे जीवन से संवंधित ही है । मैं अपने आप को इस ब्लॉग पर पोस्ट करने से नहीं रोक सका हूँ ।

आप के सामने प्रस्तुत है ---

" रात का आखिरी पहर था ,बारिश के साथ - साथ ठंडी हवा हड्डियो को अन्दर तक हिला दे रही थी । मै जितनी जल्दी हो सके घर पहुचकर बिस्तर मे घुसने के लिये आतुर था । आज मै एक कारोबारी दौरे से वापिस दूसरे शहर से अपने शहर मे आ रहा था । दूर दूर तक आदमी तो छोडिये जानवर, कुत्ता ,  बिल्ली भी नही दिख रहे थे । मै पूरी रफ्तार से कार मे बैठा अपने घर की ओर बढा चला जा रहा था । कार के दरवाजे बन्द होने के वावजूद  दम निकली जा रही थी । बाहर हल्की बारिश हो रही थी। लोग अपने घरो में , अपने बिस्तरो मे दुबके नीद का मजा ले रहे होंगे  ।

जैसे ही कार  , मैने अपनी गली की ओर मोडी , दूर से कार की रोशनी मे मुझे एक धुधंला सा साया नजर आया। उसने  बारिश से बचने के लिये सिर पर प्लास्टिक का कुछ थैला ओढ रखा था । मैंने सोचा इस बारिश मे कौन है जो बेचारा बाहर घूम रहा है । इस हालत में बेचारे कि क्या मजबूरी हो सकती है । शायद घर मे कोई बीमार तो नही । मैंने अपनी कार  उसके नजदीक ले जाके  , कार के शीशा नीचे कर सूरत देखने तथा हालचाल जानने की नीयत से आवाज लगायी ।  देखा तो हैरान रह गया , अरे ये तो हमारे पडोसी मोहन जी है जो रेल्वे मे लोको पायलट है। मैने नमस्कार कर हालचाल जानने की नियत से पूछा कि इतनी रात मे आप कहॉ जा रहे है ?  तो उन्होंने बडे ही शिष्टाचार से जबाब दिया - डयुटी । मैने पूछा ,,,,,इतनी रात को  ? तो उन्होने किसी मासूम बच्चे की तरह हॉ मे सिर हिलाया। और आगे बढ गये ,,,,,,,,,

इस छोटी सी मुलाकात ने मुझे अन्दर तक सोचने पर मजबूर कर दिया । मै चैतनाशुन्य मे खो गया ,,,,कि एक व्यक्ति जो हमारी यात्रा को सफल बनाने के लिये क्या क्या झेलता है न मौसम की परवाह न ही परिवार की ,,,,,,,इसको कितने मिलते होगे शायद 30000 या 50000  ,,,,,,,, पर वो सुख  , वो नीद , वो चैन ,  ये कभी ले पाता होगा या ले पायेगा ,,,,,,,पता नही  ,,,शायद ऐसे ही कर्मठ और जिम्मेदार लोगो की वजह से ये दुनिया टिकी हुई है ।

मेरा मन चाहा कि गाडी से उतर कर आदर स्वरुप उन्हें गले लगाऊ पर वो जा चुके थे ,,,,,पर दूर कही से एक तेज आवाज सुनायी दी थी जो शाायद किसी रेलगाडी के हॉर्न की आवाज थी ,,,,,,,
सलाम है ऐसे कर्मठ वीरो को 
" 
( कर्मठ लोको पायलटो को समर्पित । प्रेषक और लेखिका - तुलसी जाटव लेक्चरर / मैथ )

Friday, November 25, 2016

माँ वैष्णो देवी यात्रा - 4

आज 6 मई 2016 है । आज कोई प्रोग्राम तो नहीं है । सुबह करीब 10 बजे होटल मैनेजर का फोन आया ।  उसका कहना था कि दोपहर तक 24 घंटे हो जायेंगे , अतः कमरा खाली करेंगे या एक्सटेंशन लेंगे ? मैंने उसे बताया कि दस ग्यारह बजे रात  को कमरा खाली करूँगा । उसने कहा कि तब दो दिनों के चार्ज लगेंगे । " कैसा इंसाफ है यार , कुछ ही घंटो की तो बात है । क्या कुछ एडजस्ट नहीं कर सकते क्या ? " -  मैंने उससे पूछा । मैं कुछ नहीं कर सकता सर , ये तो लॉज के नियम में शामिल है । मालिक के साथ गद्दारी तो नहीं कर सकता । उसने बड़ी ही नम्रता से अपनी बात कह डाली । इस कर्मचारी के ईमानदारी पर खुशी भी हुयी । फिर उसने ही कहा - साब एक काम कीजिये आप 6 बजे तक खाली कर दें । केवल आधे दिन का एक्स्ट्रा चार्ज पे कर दीजियेगा । चलो ठीक है । नहीं से कुछ तो भला । मैंने हामी भर दी । सुबह बाजार जाने का प्लान था  किंतु शाम को 6 बजे के बाद क्या करेंगे ? अतः प्रोग्राम कैंसिल करनी पड़ी । जो खरीदना है वह शाम को ही खरीद लेंगे ।

जम्मू के वातावरण में कोई खास गर्मी नहीं थी । हल्का धुप था । वादे के मुताबिक करीब 6 बजे संध्या को लॉज खाली कर दिए । जम्मू स्टेशन सामने ही था अतः ऑटो वगैरह नहीं करनी पड़ी । चलिये ऑटो के पैसे बच गए । हम पैदल ही स्टेशन आ गए , सिर्फ 5 मिनट लगे । स्टेशन के सुरक्षा घेरो को पार कर स्टेशन परिसर में दाखिल हुए । सोंचा रिटायरिंग रुम में कोई कमरा मिल जाय तो बहुत अच्छा होगा । कोशिस की किन्तु कमरे ख़ाली नहीं थे । सामान के साथ बाजार में घूमना मुश्किल था । हमने अपने सामान को लॉकर में जमा कर दिए । हमारी ट्रेन संख्या 22462 एक्सप्रेस थी , जिसका आगमन / जम्मू में रात बारह बजे के बाद था । हमने टिकट कटरा से लिए थे और बोर्डिंग जम्मू से करवा ली थी ।

अब निश्चिन्त हो बाजार की तरफ निकल पड़े । समय को व्यतीत करना भी तो मुश्किल लग रहा था । हमने बाजार से सूखे फल , रेन कोट , स्वीट , सेव और कुछ ऊनि साल ख़रीदे क्योंकि हमारे शहर के अपेक्षा बहुत सस्ते थे । साउथ इंडियन होने की वजह से नार्थ के खाने कुछ अरुचिकर लग रहे थे । फिर भी जहा तक हो समन्वय बनाना भी जरुरी था । एक दुकान वाले ने बताया कि  सामने वैष्णो देवी ट्रस्ट का निवास स्थल है । कमरे वगैरह मिलते है । ग्राउंड फ्लोर पर होटल है ववहाँ हर तरह के खाने मिलते है और बहुत साफ सुथरे है । आप लोग वहां जाकर भोजन कर सकते है  सुझाव अच्छे लगे । हमने उस दूकानदार को धन्यवाद दी और उस निवास की तरफ चल पड़े । उसने ठीक ही कहा था । बिलकुल सुन्दर अट्टालिका , साफ सुथरी । पर्यटकों के लिए किफायती दर पर कमरे उपलब्ध थे । वातानुकूलित या नॉन वातानुकूलित दोनों । खैर हमें कमरे से मतलब नहीं था फिर भी पता चला की कोई रुम नहीं है । हमने रात्रि भोजन किये । साउथ इंडियन वड़े भी खाने के लिए लिये , पर वे उतने टेस्टी नहीं थे । 

जम्मू स्टेशन के आस पास साफ सफाई नहीं थी ।  जहाँ देखो वही गन्दगी दिखाई दे रही थी । ये स्थानीय निकायों की देन है ।ज्यादा चहल पहल भी नहीं थी । जो पब्लिक थी वह यात्री या दुकान व् दुकानदारी वाले ही थे । हम भोजन के बाद वैष्णो देवी निवास के सामने बने बगीचे में टहलने लगे । अभी बहुत समय है इसीलिए वही एक खली पड़े बेंच पर बैठ गए । इंतजार के समय बहुत ही कष्टकर लगते है । इधर उधर की बाते करते रहे । अब समय साढ़े दस बजने वाले थे । हम वापस स्टेशन की तरफ चल दिए । रास्ते में  पत्नी को अचानक एक पत्थर से ठोकर लगी । वह बुरी तरह गिर पड़ी । हमने सहारा देकर उन्हें उठा  दिए । उन्हें जोर से घुटने में चोट लग गई थी। पत्नी उसी तरह कराहते हुए  स्टेशन के लॉकर तक पहुंची । ये क्या लॉकर के दरवाजे के ऊपर ताले लगे थे । पास के फल वाले दूकानदार से पूछा जो दुकान बंद कर रहा था ।उसने कहा - लॉकर दस बजे बंद हो जाते है अब सुबह 6 बजे खुलेंगे । ये सुन  ऐसा महसूस हुआ जैसे हमारे शरीर के खून ही सुख गए हो । अनायास मुख से निकला - ओह अब क्या होगा । हमारी गाड़ी साढ़े बारह बजे है और वह भी रिजर्व सीट ।

खैर जो होगा , अब तो कुछ करना ही पड़ेगा । हम पूछ ताछ कार्यालय में अपनी कहानी दोहरायी । पर उस पीआरओ के कान पर जु तक नहीं रेंगी । उलटे उसने हमें सिख देने लगा - क्या आप को मालूम नहीं है कि ऑफिस दस बजे बंद हो जाते है । देखते ही देखते और कुछ यात्री जमा हो गए , जिनके सामान लॉकर में थे और वे भी घबड़ाये हुए थे । उसने किसी भी प्रकार के मदद से इंकार कर दिया । फिर हम टीटीई के कार्यालय में गए , शायद कुछ मदद मिल सके । उस कार्यालय में कोई नहीं था , सिर्फ एक व्यक्ति दिखा जिसने सुझाव दिया की स्टेशन मास्टर से मिलिए । वह कुछ कर सकता है क्यों की वही स्टेशन का इंचार्ज है । हम स्टेशन सुपरिटेंडेंट के कार्यालय में भी गए पर दरवाजे पर बाहर से ताला  लटका रहा था । कैरेज स्टाफ मिल गए । उनसे पूछा तो उन्होंने कहा कि रात के समय यहाँ कोई नहीं रहता । मुझे आश्चर्य हो रहा था क्या ये रेलवे की संस्था है या कोई और कुछ । जहाँ देखो वहाँ किसी को भी प्रोपर ड्यूटी करते नहीं देख पा रहा हूँ । जैसे जैसे समय बीत रहा था और ट्रेन के आने का अंतर काम हो रहा था , दिल में घबराहट बढ़ती जा रही थी । दिमाग में एक सूझ आई । पार्सल ऑफिस में गया क्योंकि लॉकर इसी वाणिज्य विभाग के अंतर्गत आता है । वहाँ एक  क्लर्क मिला । उसने कहा - अब कुछ नहीं हो सकता आप सुबह 6 बजे आ जाए । मैंने अपनी दुखड़ा सुनाई पर वो बिलकुल इंकार कर गया । 

मैं अपने को निःसहाय महसूस करने लगा । देखा धीरे धीरे सभी आस पास की दुकानें बंद होते जा रही थी और जम्मू स्टेशन वीरान होते जा रहा था । जो बचे थे वे सिर्फ यात्री गण ही थे। जिन्हें कोई न कोई ट्रैन पकड़नी थी । अचानक मुझे सामने लोको पायलट की लॉबी नजर आयी । मैंने अब तक के किसी भी पूछ ताछ के समय अपनी परिचय जाहिर नहीं की थी । एक साधारण पब्लिक की तरह ही मदद की पेशकस की थी । मैं लॉबी के अंदर गया और अपना पूरा परिचय देते हुए अपनी समस्या बताई । क्रू कंट्रोलर आश्चर्यचकित हुआ और तुरन्त पार्सल ऑफिस से कांटेक्ट किये । कुछ बात बनती नजर आई । उन्होंने फोन कट कर दी और एक बॉक्स बॉय के साथ मुझे पार्सल ऑफिस में जाने के लिए निर्देश दिए । अब मैं पार्सल ऑफिस में था और वह बॉक्स बॉय जिससे मुझे मिलाया , वह वही क्लर्क था जो पहले इंकार कर चुका था । वह कुछ शर्मिंदगी महसूस किया और बोला - आप लॉकर के पास इंतजार कीजिये मैं  एक ट्रेन आ रही है उसमें पार्सल के सामान लोड करवा कर आता हूँ । मैंने स्वीकृति में हामी भर दी किन्तु लॉकर के पास नहीं गया । डर था कि कंही ये भूल न जाय इसीलिए वही ट्रेन आने तक खड़ा रहा । ट्रेन आई , उसने कुछ सामान गार्ड ब्रेक में लोड किये और एक खलासी को लॉकर की चाभी देते हुए बोला- जाओ लॉकर खोलकर साहब का सामान दे दो । हम सभी लॉकर के पास थे । अपने सामान ले लिए । अब हम अपने को बहुत सफल महसूस कर रहे थे , जैसे कोई लड़ाई जीत ली हो । और होनी भी चाहिए , ये स्वाभाविक है । हमने कुछ पैसे उस खलासी को उपहार स्वरूप देने चाहे , पर उसने लेने से इंकार कर दिया । फिर भी मेरी पत्नी उसके पॉकेट में जबरदस्ती रख दी ।

पत्नी को गंभीर चोट लगी थी पर इस आफत की घडी ने सब भुलने के लिए मजबूर कर दिया था । मैंने कई बार रेलवे की शिकायत वाली नंबर पर फोन की परंतु दूसरे तरफ से कॉल रिसीव नहीं किया गया । ऐसा लगता था जैसे कुछ समय के लिए रेलवे ठप्प पड़ गयी हो । एक छोटी सी भूल ( यानि नोटिस और सूचना पट्ट ) ने हमें इस जगह परेशानी में डाल दिया था । प्रायः हम छोटी छोटी सूचनाओं को नजर अंदाज कर देते है । पर ऐसा नहीं है । सभी अपने महत्त्व को उजागर कर ही देते है । आज हमें सिख मिल गयी थी कि हमेशा सतर्क और क़ानूनी प्रक्रिया पर ध्यान देनी चाहिए । थोड़ी सी गलती बड़ी परेशानी उत्तपन्न कर देती है । सरकारी कर्मचारी पब्लिक से कैसा व्यवहार करते है , वह सामने था । यही नहीं कभी कभी ये अपने कर्मचारी को भी मदद करने से नजरअंदाज कर देते है । एक सरकारी कर्मचारी को सदैव मदद के लिए तैयार रहना चाहिए । शायद आज के युग में स्वार्थी ज्यादा और परोपकारी बहुत कम है । यही नहीं , पब्लिक की सहनशीलता इन्हें निकम्मा बना देती है । पब्लिक को चाहिए की शिकायत पुस्तिका का उपयोग जरूर करें । आज हमारे और आप के विचारों में सकारात्मक बदलाव जरुरी है । सकारात्मक विचार उत्थान और नकारात्मक पतन के धोत्तक है ।

आगे की यात्रा के लिए इंतजार कीजिये -  माँ वैष्णो देवी यात्रा - 5 

Saturday, September 24, 2016

माँ वैष्णो देवी यात्रा -3


कटरा से जम्मू सड़क मार्ग में एक सुरंग । 
आज दिनांक 5वी मई 2016 है । आज कोई प्रोग्राम नहीं था क्योंकि माता जी का दर्शन कल पूरी हो गयी थी । यहाँ से वापसी भी 6 तारीख को था । 24 घंटे व्यर्थ न जाये , अतः कुछ भ्रमण की तैयारी करना जरुरी लग रहा था । हमने निर्णय लिया कि क्यों न सड़क मार्ग से जम्मू चला जाय । ये कश्मीर है । एक समय था जब इसे भारत वर्ष का स्वर्ग के नाम से जानते थे । आज वह खोता नजर आ रहा है । जिधर देखो उधर डर का माहौल व्याप्त है ।आतंकवादी गतिविधियों में तेजी आ गयी है । कब क्या हो जायेगा , कोई तय नहीं कर सकता । इसकी आशंका होटल मालिक ने कर दूर कर दी । उसने कहा की आप आराम से बिना भय के कटरा से जम्मू जाएँ । कोई परेशानी नहीं होगी । कहे तो मैं टूरिस्ट कार की व्यवस्था कर देता हूँ । यह भी बिलकुल साठीक सुझाव था । किसी अनजाने की कार को भाड़े पर ले जाना ठीक नहीं था । हमने होटल टुडे के माध्यम से एक कार किराये पर ली । भ्रमण कराते हुए जम्मू तक छोड़ने का 1500/- रुपये । चलो ठीक है । करार हुयी और हमने अपनी यात्रा 10 बजे से शुरू की । हमने अपने पुरे सामान कार में रख दिए और होटल टुडे को अलबिदा कहा ।

हमने मन ही मन बैष्णो माताजी को प्रणाम किये और सुख शांति की दुआ की आग्रह के साथ फिर दुबारा आने की लालसा व्यक्त की । कार कटरा के छोटी छोटी गलियो से होते हुए शहर से बाहर निकला  मुझे ट्रेन की सफ़र तो पसंद
 है ही , पर कार की मजा अलग ही होती है । हम सब कुछ करीब से देख और परख सकते है ।कार  दोहरी सड़क पर दौड़ने लगी । चारो तरफ हरियाली ही नजर आ रही थी जबकि गर्मी का मौसम था । इन वादियो के नज़ारे बरसात में देखते ही बनते होंगे । जंगलो और झाड़ियो में गाँव दिखाई दे रहे थे किन्तु प्रत्येक घर एक दूसरे से दुरी पर थे । वीरान और सुनसान सा । इसीलिए आतंकवादियो के मनसूबे सफल हो जाते है । जेहन में एक तरह से डर भी लग रहा था और आनंद भी । चलते चलते कई पिक भी लिया गया ।

सेल्फ़ी लेने में मजा है या अपनी जिगर की चाहत । क्या हम अच्छे लगते है । ये भी एक आधुनिकता की पहचान है । आये दिन इस कृत से कईयो की जाने भी जा चुकी है । हमारी यात्रा आगे बढती रही । सडको के किनारे हरियाली और नयी नवेली सड़क मुग्ध कर रही थी । सड़क यात्रा के दौरान मंदिर और संग्रहालय व् एक छोटा सा चिड़ियाघर दिखा । रास्ते में ही कौल कंडाली माता बैष्णो देवी जी का मंदिर है । इस जगह से माता जी का लगाव था । कहते है की इसके दर्शन भी बैष्णो माँ के दर्शन पुरे कर देते है । यह मंदिर यहाँ के लोकल लोगो के प्रबवधन में है । साफ सुथरा है । यहाँ एक कुँआ भी है जिसके पानी पिने से फल की प्राप्ति होती है । मैं विस्तार में नहीं जाना चाहता । आप खुद ही पिक और विवरण को पढ़ जानकारी प्राप्त कर सकते है । 
जूम कीजिये और विवरण पढ़िए ।
जूम कीजिये और विवरण पढ़िए ।
जूम कीजिये और विवरण पढ़िए ।
जम्मू घाटी की एक सुखी बरसाती नदी ।
ये एक कश्मीरी राजा के बंशजो द्वारा बनायीं गयी अमर महल संग्रहालय है । इसे हरी तारा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा चलाया जाता है । जिसमे उनके कुछ परिवारो की तस्वीर प्रदर्शित है । श्रीकरण सिंह । एक सोने का सिंहासन  भी है । इसके अंदर जाने का किराया मात्र 20 रुपये प्रति व्यक्ति है । एक तरफ नदी तो दूसरी तरफ हरी भरी फुलवारी है । कार , मोटर या टूरिस्ट बसो के लिए पार्किंग भी है । जीवन में बहुत से म्यूजियम देखे है किन्तु यहाँ निराशा ही हाथ लगी ।  इसके आस पास के बगीचे में घुमे । आम के पेड़ो पर मोजर आ गए थे । चौकीदार छूने नहीं दे रहे थे । यहाँ से निकल कर चिड़ियाघर पहुंचे । यहाँ भी इक्के दुक्के पक्षी और कुछ बाघ के सिवा कुछ नहीं था । 
अब हम जम्मू शहर में आ गए थे । यहाँ एक मंदिर है ।जिसे देखने गए । दरवाजे पर सिक्युरिटी वाले सब कुछ चेक किये । मोबाइल या कैमरे अंदर ले जाना मना है । हमने प्रमुख द्वार के खिड़की पर जमा कर दिए । मंदिर के अंदर कोई खास भीड़ नहीं था । मंदिर के प्रांगण में अलग अलग कई कमरे है । इन सभी कमरो में अलग अलग देवी - देवताओ की मूर्तिया है और सभी जगह एक पुजारी का ड्यूटी था । जिस मंदिर में भी गये ,  वहाँ पुजारी के मंत्रो का सामना करना पड़ा और उस के एवज कुछ न कुछ दक्षिणा देना पड़ा । प्रभु के भोग या गरीब अन्न दान के स्वरूप  । जो एक पारंपरिक रिवाज है । 
जो भी हो भगवान सबके दाता है । जो नसीब में होगा भाग कर आएगा। जो नहीं होगा वह लाख चतुराई के बाद भी चला जायेगा ।
दोपहर के दो बजने वाले थे । कोई विशेष दर्शनीय स्थान न होने की वजह से यात्रा समाप्त करनी पड़ी । अतः हम आश्रय के लिए एक लॉज में गए । जो रेलवे स्टेशन के ही नजदीक था । शाम के समय बाजार में खरीददारी हुई । लेकिन हाँ यहाँ जेहन में हमेशा डर सत्ता रहा था । ये कश्मीर है पहले जैसा नहीं । अब कल की यात्रा यानि 6 मई 2016 - अगले कड़ी में । इसे जरूर पढियेगा । यह मेरे जीवन का एक अजूबा था या भूल । कुछ कह नहीं सकता ।
अब फिर मिलेंगे " माँ वैष्णो देवी यात्रा - 4 " में 



Saturday, July 2, 2016

माँ बैष्णो देवी यात्रा - 2

मेरी जीवन संगिनी और बाला जी ।  कटरा स्टेशन 
कटरा स्टेशन में हमने कुछ तस्वीर अपने मोबाइल में कैद किये । हमें रेलवे को बधाई देनी पड़ेगी जिसने इन खूबसूरत कश्मीर के वादियो में पहाड़ो को काट छांटकर एक सुन्दर स्टेशन का निर्माण जो किया है । मई का महीना गर्मियों भरा होता है फिर भी चारो तरफ हरियाली थी । मौसम तो बादलो से ढका जैसा । नरम सी सर्दी लग रही थी । प्राकृतिक की सर्दी कृतिम सर्दी से लाखगुना अच्छी लग रही थी । जिधर देखो उधर ही नजरो को सिर्फ व् सिर्फ हरियाली  ही दिखाई दे रही थी। स्टेशन से बाहर आते ही पहाड़ो के ऊपर माँ वैष्णो देवी जी का मंदिर दिखाई दे रहा था । जाने आने के रास्ते नजर आ रहे थे । बाहर कोई ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं था । दर्शनार्थियों को यात्रा के पूर्व पंजीकरण की पर्ची लेनी पड़ती है । जो पूर्ण रूप से कम्प्यूटरिकृत है । यह सुविधा रेलवे , बस स्टैंड और जहाँ से यात्रा शुरू होती है ( वाणगंगा ) में उपलव्ध है । हमने अपने  पंजीकरण यही से करवा लिए क्यों की हम रेलवे स्टेशन में मौजूद थे । इस प्रक्रिया से सभी को गुजरना पड़ता है । इसमे हमारे नाम , स्थान को हमारे पिक के साथ रेकॉर्ड किया जाता है और एक टिकट व्यक्ति को दी जाती है । इस कार्ड की जरुरत यात्रा के दौरान कई जगहों पर पड़ती है । आवश्यकता के समय सुरक्षाकर्मियों को दिखानी पड़ती है । इसे सुरक्षा कर्मी मंदिर में प्रवेश करने के पहले ले लेते है । कटरा स्टेशन भाग दौड़ की शहरी जिंदगी से बिलकुल शांत लगा । साधारण भीड़ । एक झुण्ड में सिमटे घर ।

हम स्टेशन से बाहर निकले । इस अनजान शहर में एक आश्रय की जरुरत थी । कोई जान पहचान वाला नहीं था । अतः होटल के कमरे लेना जरुरी था । सामने रोड पर एक दलाल घूम रहा था । हमें खड़े देख पास आया और पूछा - साब रूम चाहिए क्या ? हमने हामी भरी तो उसने कहा - मिल जायेगा । ये सी या नार्मल ? कटरा का वातावरण बिलकुल ठंढा था अतः वातानुकूलित का प्रश्न नहीं था । हमने कहा - नार्मल रूम चलेगा । किन्तु साफ सुथरा रहनी चाहिए । उसने कहा - आप चल कर कमरा देख ले । पसंद आये तो रहे अन्यथा दूसरे जगह ले चलूँगा । 1200/- लगेगा । हमने कम कराये तो हजार पर राजी हो गया । उसने किसी को फोन किया और एक कार सामने आकर रुकी । हमें बैठने का इशारा हुआ । हम लोग कार में बैठ गए । करीब 2 मिनट में कार एक होटल के पोर्टिको में प्रवेश किया । जिसका नाम होटल टुडे है जो रेलवे स्टेशन रोड में स्थित है । हमने प्रोग्राम के अनुरूप रुम का मुआयना किया । रूम बिलकुल अच्छे थे । हमारी सहमति के बाद कागजी प्रक्रिया पूरी हुई । होटल का मैनेजर हमारी आईडी नहीं पूछा । जबकि हम तैयार होकर चले थे । हमने हमारे कमरे में प्रवेश किया जो ग्राउंड फ्लोर पर ही था ।

हम दिन चर्या से निवृत होकर तैयार थे । नास्ते का समय था । हमने होटल से ही आलू पराठे और दही लिए । आदत तो नहीं था पर स्वाद अच्छे लगे । आज आराम करने का प्रोग्राम था  चुकी कोई थकावट तो नहीं थी । इसीलिए हमने आज ही मंदिर जाने के प्रोग्राम तय कर ली । होटल वालो ने भी बताया  की अभी जाने से शाम तक वापसी संभव है । यहाँ के होटलो में एक समानता है । सभी के पास अपनी कार है । ये यात्रियों को मुफ़्त में रेलवे स्टेशन या वैष्णो देवी यात्रा की शुरुवाती द्वार वाणगंगा तक  ले जाते है और वापस भी ले आते है । तो हमने पूर्णतः आज ही मंदिर जाने का निश्चय कर लिया ।

बालाजी होटल के मुख्य द्वार पर ।


होटल का मैनेजर अपने कार के ड्राईवर को निर्देश दिया की साहब को वाणगंगा तक छोड़ आये , जहां से माँ के मंदिर के लिए यात्रा शुरू होती है । उसने वही किया । हम वाणगंगा के नजदीक बाजार में थे जहा कार ड्राईवर ने हमें छोड़ी थी । चारो तरफ प्रसाद की  दुकाने लगी हुई थी । दुकान दारो ने अपने दलाल छोड़ रखे थे ।  हमें अपने तरफ आकर्षित करने लगे । हम पहली बार आये थे अतः प्रसाद खरीद लिए । मुख्य द्वार की तरफ चल पड़े । एक छोटा भेंडर आया और चांदी  के सिक्के मातादी के तस्वीर वाले लेने  के लिए विवश करने लगा । हमने अपनी अनिक्षा जाहिर की । वह गिड़ गिड़ाने लगा । साहब ले लो । यही हमारे जीविका  का साधन है । सौ रुपये में 6 ले लो । हम अनजान सा आगे बढ़ते रहे । वह मायूस हो गया और बोला - साहब आप लोग दूसरे जगह हजारो खर्च कर देंगे पर गरीब की भलाई के लिए कुछ नहीं सोंचते । बात पते की थी । कटु सत्य । मेरे मन में उसके प्रति सहानुभूति जगी और मैंने न चाहते हुए भी 6 चांदी के सिक्के जिस पर माँ की तस्वीर छपी थी ले लिए । उसके मुख पर मुस्कराहट खिल  पड़ी । 

कुछ आगे बढ़ते ही पालकी और घोड़ो के मालिको से सामना हुई । वे भी घेर लिए । श्रीमती जी शुगर की मरीज है । पैदल यात्रा संभव नहीं था । घोड़े या पालकी जरुरी था । मुझे भी पैदल की आदत नहीं है । पालकी वाले 5 हजार और घोड़े वाले ने 1850/- की मांग रखे वह भी प्रति व्यक्ति । हेलीकॉप्टर से जाने का प्लान था किन्तु इसकी बुकिंग 2 माहपूर्व करनी पड़ती है । करेंट संभव नहीं था । माँ की यात्रा , और पॉकेट पर बल न पड़े अतः हमने घोड़े की सवारी का निर्णय किया । बहुत जद्दो जहद के बाद 1500/- प्रति व्यक्ति पर जाने और ले आने की बात बनी । घोड़े पर सवार होने के लिए जगह जगह प्लेटफॉर्म बने हुए है । घोड़े की सवारी भी अजीब लगी । घोड़े के टॉप और हमारे शरीर में उछल कूद आनंददायी थे पर यात्रा के बाद कमर को दर्द का अहसास हुआ । वाणगंगा से मंदिर की चढ़ाई 13 किलोमीटर है । इसी रास्ते में अर्धकुआरी माता जी का मंदिर है । जिनका दर्शन करने के लिए एक गुफा से गुजरना पड़ता है । जो सभी के लिए उपयुक्त नहीं है । घोड़े से यात्रा करने के समय यह मंदिर बाईपास हो जाता है । अगर मन में इच्छा हो तो घोड़े के मालिको से कह , यहाँ भी जाया जा सकता है । चढ़ाई के रास्ते पक्के है । जगह जगह शेड भी मिल जाते है । छोटे छोटे दुकान भी मिलते है। रास्ते में पड़ने वाले दुकान बहुत पैसे वसूल करते है क्योंकि उन्हें अपने सामान घोड़े के माध्यम से लाने पड़ते है ।  वैसे तो गर्मी का मौसम था किन्तु सुबह से धुप नदारद थी  । उस पर यात्रा के दौरान एक दो जगह बारिस भी हुई जिससे मौसम खुशनुमा हो गया था । लोग पेट के लिए क्या क्या न करते है । हम घोड़े पर बैठे थे और उनका मालिक उन्हें पकड़ कर निचे चल रहे थे । यात्रा के दौरान जगह जगह चेक पोस्ट मिले ।

तीन साढ़े तीन घंटे के बाद हम मंदिर के क्षेत्र में प्रवेश कर गए । घोड़े वाले अपने घोड़े के साथ आराम गृह में चले गए और अपना मोबाइल नंबर देकर गए । जम्मू कश्मीर में प्रीपेड मोबाइल ( बाहर राज्य के ) काम नहीं करते है । पोस्ट पेड कार्य करते है । मेरे पास पोस्टपेड था । मंदिर के प्रांगण में जुत्ते चप्पल मोबाइल बेल्ट या कोई भी सामान लेकर जाना पूरी तरह से प्रतिबंधित है । हमने अपने सभी सामान शिरीन बोर्ड के लॉकर में जमा कर दिए । मंदिर के अंदर जाने के पूर्व हमारे पंजीकरण कार्ड सुरक्षा कर्मियो ने ले लिए । दर्शन के लिए ज्यादा समय नहीं लगा । माताजी का दर्शन आराम से हो गया ।

बाहर निकलने के वक्त मिश्री के पैकेट और एक चांदी के सिक्के प्रसाद के रूप में मिले । करीब तीन बजते होंगे । बाहर शिरीन के भोजनालय में भोजन करना पड़ा । पहाड़ियों को काट कर सरकारी या प्राइवेट इमारते बनी है ।  इतनी ऊँचाई पर जहाँ सामग्री को लाना काफी कष्टकर और महंगा है , फिर भी पूर्ण सुविधा उपलब्ध है । हाँ एक बात जरूर है कि किसी आपदा के समय राहत कार्य बहुत कठिन साबित हो सकता है । कोई भी यहाँ ज्यादा ठहराना नहीं चाहेगा । माताजी के दर्शन अधूरे समझे जाते है यदि आपने भैरव बाबा के दर्शन नहीं किये । भैरव बाबा का मंदिर करीब 2 किलोमीटर ऊपर है । हमने लॉकर से सामान लिए और भैरव बाबा जी के लिए रवाना हो गए । ये एक छोटा सा मंदिर है । इसके समीप एक गैलरी है । जहाँ से निचे के नजारे अदभुद दिखाई देते है । यहाँ हमने भैरव बाबा के दर्शन किये । आकाश में बदल घिर आये थे । कभी भी बारिस आ सकती थी । लौडस्पीकर में उदघोषणा हो रही थी कि भक्तो से निवेदन है कि यहाँ न ठहरे । कृपया वापसी के लिए तुरंत प्रथान करें क्योंकि मौसम अच्छा नहीं है । अब हम भी घोड़े से वापस चल दिए ।

चढ़ाई के वक्त तकलीफ महसूस नहीं हुआ पर पहाड़ के ढलान पर घोड़े की दौड़ तकलीफदेह लगी । करीब 7 बजे तक वाणगंगा आ गए । हमने माता के दरबार में फिर आने के कामना के साथ माँ से दुआ मांगी और एक होटल में जाकर भोजन किये । होटल मैनेजर को फोन किये । उसने अपनी कार भेजी और हम अब होटल के प्रांगण में थे । कोई भी यात्रा सुखदायी नहीं होती पर हमारे अदम्य साहस और आस्था वहां खीच  ले जाती है । सुख की घरेलु व्यवस्था सभी जगह नहीं मिलती है । हमें अपने को यात्रा के बिच आने वाले अड़चनों से सामंजस्य बनाये रखना पड़ता है । यह भी सत्य है कि यह सबके लिए नसीब नहीं होता ।
आगे की कथा भाग - 3 में ।